चिटठी पत्री……
य तो सबै जाणनी कि हमर उत्तराखंड द्वि मंडलों में बंटी हुई छु। कुमाऊं ( कुर्मू) और गढ़वाल। कुमूं में कुमाउनी और गढ़वाल में गढ़वालि बुलाई जैं। इनु द्वियै लोक भाषाओं क लै आपण आपण कएक लोक उपबोली छन।
इनु लोक भाषाओं में भौत कुछ हर विधा में लेखी जाणौ। लोक भाषाओं क साहित्यकार कवि, लेखक और पत्रकार आपण आपण तरब बटी ल्यखणई और इनर बिकास में लागि रई। मैं नै उत्तराखंड है भ्यैर रौनेर भै बंद लै आपणि आपणि बाटों इनर बिकास में लागि रई। लोक भाषाओं में छपणी पत्र-पत्रिका लै इनर बिकास में उरातार लागि रई। य लै भौत खुशिकि बात छु। खूब लेखी जाणौ। किताब छपणई । पर य काम सब व्यक्तिगत स्तर पारि आपण आपण प्रयासों ल हुण लै रौ।
सरकारि स्तर पारि ‘उत्तराखंड भाषा संस्थान ‘बणै बेर सरकारैल लै आपण काम करि है लौ। भाषा संस्थान लै बर्तमान में हर बर्ष किताब छपौणकि लिजी अनुदान दिणौ। साहित्यकारों कैं पुरस्कृत करणौ। य है अघिल हौर के के सुधार करी जै सकीं जैल लोक भाषाओं भल बिकास हओ और साहित्यकारों कैं लै सई तरीकैल लाभ मिलि सको। य पारि सोची जाणैकि जरवत छु।
देखण में उणौ कि पुस्तकों कि लिजी अनुदान ल्हिण महत्वपूर्ण हैगो। जैक कारण लोक भाषा साहित्य पछिल छुटणौ। जां तालै लोक भाषाओं क साहित्यकारों कैं पुरस्कृत करणै कि बात छु। उमें लै निष्पक्ष चयन में सवाल उठणईं। यस लागणौ लोक भाषा साहित्य सृजन है जादे महत्वपूर्ण पुरस्कार हत्यौण है गई। पुरस्कारों क चक्कर में कएक साहित्यकार झुटिमुटि जानकारी दि बेर पुरस्कार पाणई। य भौत
अनपेक्षित मात्रा
मिन स्वाचि यार बात बि सै च मिइख कितबि टटोळदा टटोळदा अपणि आंखि छौ फ्वड़णू। अपणु बगत छौ खपाणूं सुद्दी कलम घिसणू छौ। कागजै बि भत्या भंग कनू छौ । इलै त ब्वल्दीन लोग कलम घसीटू। जब तौर तरीका नि सीखु त ।
अब मिन ऊंखुणै ब्वाल भैजी मि तुमर चेला बणण चांणू छौ। मिथै सिखावा तौर।
य बाट प्राप्त धनराशि कैं कोष में जाम अफसोसजनक बात छु। य धैर्यपूर्वक सोचणकि बात छु कि जो हिसाबैल पुरस्कार देई जाणई। कुछै बखत में साहित्यकार दुनि बेर लै नि मिलो। ऐलक बखत में साहित्यकारों क चयन में धैर्य और निष्पक्षता ल सम्यक चयन करण जरूड़ी छु। गलत बाट और चाटुकारिता है बचण कि जरवत छु। पुरस्कारों कि लिजी आवेदन प्रथा बंद हुण चैं। यैकि जाग में प्रदेश स्तर पारि साहित्यकारों क व्यक्तित्व और कृतित्व कैं प्रदर्शित करणी गैलरी बणाई जाण चैं। भाषा संस्थान खुद साहित्यकारोंकि पांडुलिपि कैं छपाओ और देश प्रदेशाक पुस्तकालयों वाचनालयों में किताबों कि बिक्री करी जो करी जो। यैक कुछ अंशैल साहित्यकारों कैं रॉयल्टी देई जै सकीं।
पुरस्कारों क लिजी साहित्यकारों क चयन गैलरी में मौजूद उनर साहित्य में बटी करी जाण चैं। चयन समिति में लोक भाषाओं क जानकार, ईमानदार और निष्पक्ष विद्वानों कैं धरी जाण चैं। पुरस्कारों क लिजी पुस्तकों क चयन में प्रकाशन बर्षों कि बाध्यता नि हण चैनि। पुस्तक क्वे लै बर्ष प्रकाशित हओ उ संस्थान द्वारा पैली पुरस्कृत नि हुण चैनि।
यां आपण आपण बाटों काम करण में हमरि भाषाओं क मुख्य काम — लोक भाषाओं क मानक रूप तै करण, एक सशक्त पाठ्यक्रम बणूण और संविधान कि अतूं अनुसूची में शामिल करण क काम छुटि जाणौ। य बात सबन कैं कान खोलि बेर ध्यान धरि बेर सुणि लिहण चैं कि सरकार य में आब अघिल कै के करणी न्हांति। म्यर सुझाव छु कि बैंक लिजी हम सबन कैं एकबटीण पड़ल। जागरूक विद्वानों क एक सशक्त शिष्टमंडल बणाई जाओं । जो मुख्यमंत्री ज्यू दगै बातचीत करो। य बातचीत में भाषा संस्थान क निदेशक और भाषा मंत्री ज्यू कैं लै बुलवाई जाओ। आमणी सामणी भैटि बेर बातचीत करी जाओ। सुझाव और सुझाव पत्र देई जाओ। तबै के है सकूं। नतर के हुणी न्हेँत। मिकैं उमेद छु कि मुख्यमंत्री ज्यू जरूड़ हमरि बात बिकास क बाट प्रशस्त इल। मानाल। और हमरि लोक भाषाओं क विकास क बाट प्रशस्त हल।
