रंत रैबार ब्यूरो….
देहरादून । दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर सी उत्तराखण्ड का वरिष्ठ साहित्यकार एवं शोधकर्ता डॉ. सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी की द्वी महत्वपूर्ण किताबी उत्तराखण्ड का पारम्परिक बाल साहित्य अर उत्तराखण्ड का पारम्परिक बाल मनोरंजन अर खेल का विमोचन का साथ ही एक विशेष परिचर्चा कु आयोजन करेगी।
कार्यक्रम मां साहित्यकारों, शोधार्थियों अर संस्कृति प्रेमियों न बड़ी संख्या मां सहभागिता करीक इ किताबी उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति विरासत का संरक्षण की दिशा मां एक महत्वपूर्ण योगदान बताई ।
ए मौका पर बाल मनोविज्ञानी अंबरीष विष्ट न बोली कि उत्तराखण्ड का पारम्परिक समाज मां बच्चों कु जीवन, प्रकृक्ति, लोक-संस्कृति, परिवार अर सामुदायिक जीवन गहराई सी जुड्यूं थौ । वे जमाना मां मनोरंजन का साधन मोबाइल, टेलीविजन अर डिजिटल माध्यम नि था बल्कि लोकगीत, लोककथाएं, लोरीगीत, अखांणा पखांणा, मेला, पर्व त्योहार अर कै प्रकार का पारम्परिक खेल होंदा छा । इ गतिविधि केवल मनोरंजन तक ही सीमित नि छै बल्कि बच्चों का व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिक संस्कार, नेतृत्व क्षमता, सहयोग भावना अर रचनात्मक सोच का विकास म भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाँदा छा।
वरिष्ठ साहित्यकार महाबीर रवांल्टा न बोली कि डॉ. सेमल्टी न अपणा व्यापक अध्ययन, क्षेत्रीय भ्रमण अर जनसंपर्क का माध्यम सी उ पारम्परिक मनोरंजन, खेल, लोरी, अर अनेक प्रकार कु बाल साहित्य परम्पराओं कु संकलन करी जु समय का साथ विलुप्ति का कगार पर पौंछण्यां छन । ऊंकि इ किताबी उत्तराखण्ड की लोकस्मृति, सांस्कृक्तिक पहचान अर सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण दस्तावेज का रूप मां सामणी औंधन ।
अलका मोहन शर्मा न बोलि कि वर्तमान डिजिटल युग मां जब बच्चा अपणी जड़ों अर स्थानीय सांस्कृतिक
परिवेश सी दूर होंण्यां छन तब इनि किताब्यौँ कु महत्व हौर भी जादा बढ़ी जांदु ।
प्रो. गुड्डी बिष्ट न बोली कि बाल साहित्य बच्चों का मनोरंजन का साथ ही साथ ऊंका बौद्धिक, भावनात्मक अर नैतिक विकास का प्रभावी माध्यम छन। स्थानीय बोली-भाषा अर लोक परम्पराओं पर आधारित साहित्य बच्चों तैं अपनी संस्कृति अर सामाजिक परिवेश सी ज्वण्ण कु महत्वपूर्ण काम कर्तुं । उत्तराखण्ड का पारम्परिक बाल साहित्य किताब मां लोरी, बालगीत, लोक-कथा, पहेली, संस्कार परक साहित्य, प्रकृक्ति अर पर्व त्योहारों सी जुड्यूं साहित्यिक रूपों कु भौत बड्डु संकलन प्रस्तुत करेंगी । वक्ताओं द्वारा ब्वलेगि कि
उत्तराखण्ड का पारम्परिक बाल मनोरंजन एवं खेल ” किताब बच्चों का शारीरिक अर मानसिक विकास सी जुड्यां ऊं खेलों कु दस्तावेज छ ज़ौं मां कै मँगा साधन की आवश्यकता नि हों दि छै। स्थानीय संसाधनों पर आधारित इ खेल बच्चों मां सामूहिकता, निर्णय क्षमता, अनुशासन अर सृजनात्मकता कु विकास कर्दा छा ।
ए मौका पर उपस्थित साहित्यकारों, शिक्षाविदों अर प्रबुद्ध जनों न डॉ. सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी का ए श्रमसाध्य अर दूरदर्शी प्रयास की सराहना कर्दु बोलि कि ऊंकि इ द्वी किताबी आँण वाली पीढ्यों का ज्ञान, प्रेरणा अर सांस्कृतिक चेतना कु महत्वपूर्ण स्त्रोत सिद्ध होली । ऊंन स्कूलों, पुस्तकालयों
अर शैक्षणिक संस्थानों मां इ किताबी उपलब्ध कराण की आवश्यकता पर भी बल दीनि । यूं द्वी किताब्यौँ कु प्रकाशन समय साक्ष्य, देहरादून द्वारा करेगी ।
कार्यक्रम कु आयोजन दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र कि और सी करयेगी, जैमां लेखक, साहित्यकार, शोधार्थी अर बड़ी संख्या मां प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रैंन । संचालन ज्योत्सना जोशी न करी ?। कार्यक्रम कु समापन उत्तराखण्ड की लोक सांस्कृतिक परम्पराओं का संरक्षण अर संवर्धन का सामूहिक संकल्प का साथ मां है।
ए मौका पर रानू बिष्ट, डॉ. सूरज पंवार रमा कांत बेंजवाल, ओम प्रकाश सेमवाल, वैभवी पंवार, कांता घिल्डियाल , बीना बेंजवाल, चन्द्रशेखर तिवारी, प्रवीन भट्ट, देवेन्द्र कांडपाल, कल्याण बुटोला, डॉ. डी. के. पांडे, डॉ. लालता प्रसाद डॉ. इन्द्रजीत सिंह, डॉ.एस.पी. सेमल्टी, आलोक सरीन, डॉ. सत्यानंद बडोनी, जगदीश सिंह महर, अभिषेक मैन्दोला, हरिचंद निमेष, के. आर. उनियाल, दयासागर उनियाल, दीपक शर्मा, मुकेश भट्ट, शालू जोशी, श्रीमती अनीता शर्मा, श्रीमती रीना उनियाल, डॉ. पवन कुदवान, अर कै लेखक, साहित्यकार अर साहित्य प्रेमी उपस्थित रैन।
