रंत रैबार ब्यौरो…..
विकास का नौ पर आज डाला कटै जाणा छन यां कु उदाहरण देहरादून-ऋषिकेश मार्ग मा सात मोड पर 3000 डालों की बलि दिये जाणी छ। विकास का नौं पर होण वळा प्रयोगों से आम आदिम परेशान छ। वो यीं परेशानी को सबब एक सामायिक प्रक्रिया समझी चल्नू छ पर असल बात वेकि समझ से भैर छ। किले कि प्रकृति संरक्षण हमरि संस्कृति को हिस्सा नि बणे सकणू छ। एकदां डाळ्यूँ तैं बचौणों गौरादेवी का नेतृत्व सुन्दरलाल बहुगुणा अर चण्डी प्रसाद भट्ट का दिशा निर्देशन मा चिपको आंदोलन चलै ग्ये छौ। भले ही तब यो आंदोलन लोग्वी आर्थिकी अर जीवंतता से जुड्यूं रै हो, भले ही तब यि नेता अर महिला शक्ति ये आंदोलन का मर्म से अजाण रै होला पर कालांतर मा लोगुन अपण बणों कि रक्षा कैकि साबित कर ये कि अगर जंगळ निराला त वृंको बि अस्तित्व शेष नि रैण्य। यीं वजै छ कि यूं पर्यावरणीय दगड्यों को विश्व स्तर पर सम्मान करे ग्ये। देश का नेतोंन भले ही डाळ्यों का यूं रखवाळों को प्रयास अंक्वे नि कि हो पर विश्व स्तरीय संस्थों न यूंका प्रयास तैं अति महत्वपूर्ण समझि।
धरती मा पर्यावरण संतुल्न वास्ता जरूरी छ कि लोक परम्परा कु निर्वाहन कर्द प्रत्येम मनखी तैं डाला लगाण चैंदन, किलै कि डालों सि प्राणवायु मिल्द। दिखे जाव त हरेला पर्यावरण संरक्षण कु पर्व छ अर दगडि उत्तराखण्ड की संस्कृति कु प्रतीक बी छ।
पर्यावरण तैं बचौणा अकाट्य सच छ। हम जब आर्थिक दोहन कर्दा त थोड़ा टैम का वास्ता हमतें फैदा जरूर नजर औंद पर सदान्यों खुण हम विनाश कि बुन्याद रख दिंदा। जब तक आम ग्रामीणों, युवाओं अर महिला शक्ति तैं यी बातौ अहसास नि होलो कि पर्यावरण रक्षा कैकि वो प्रकृति तें बचौणो प्रयास कना छां तब तक सब कुछ हवाई साबित होलो। पृथ्वी आज सलातम छत सिर्फ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण का बल पर, जबकि भौतिकवादी सोच का लोग यूतैं राष्ट्र विशेष कि पूंजी मानी चल्दन। जल-जंगल-जमीन मानव जीवन का आधार छन। यूंकि तुलना पूंजी से कनु घातक छ। वैश्विक स्तर का सर्वेक्षण से पता चल्द कि पिछला 20 साल मा 15 सौ करोड़ डाळा काट दिये ग्येनि। सिर्फ पूंजी का दृष्टिकोण से यी सम्पत्ति को अनैतिक दोहन मनख्यों खुण खतरा कि घण्टी छ। वो डाळा जो कि क्लाइमेट चेज कन वळा सीओटू गैस बचैकि रखदन यांसे यांक उत्सर्जन कि गति बढ़ गये। पूरी दुन्य वृक्ष विनाश को नतीजा द्यखणी छ पर यांपर रोक वास्ता क्वी सर्वग्राही सोच विकसित कनौ कैका पास बि कारगार तकनीक नी छ। बढ़दा तापमान का चल्द औण वळि प्राकृतिक आपदों मा बढ़ोत्तरी होलि। भूजल स्तर मा कमी औण से पेयजल संकट राष्ट्रीय आपदा को स्वरूप ल्हे लेलो। यिनि स्थिति कि कल्पना कर्द हि विचारकों तैं चिंतित हवे जाण चयेणू छ। न सिर्फ चिंता कनु बल्कि एक ग्लोबल आह्वान करे जाण चयेणू छ। जैमा पारिस्थितिकी क्षरण से होण वळा नुकसान को लेखाजोखा हो। य बात आम आमिदै समझ मा डळ्न पड़लि। यांखुण धरती हैं बचौणो सतत अर्थतंत्र वळा डालों तैं बचौणै जर्वत छ।
मौलिकता से जुड्यूं एक मुद्दा यो बि छ कि पलायन का चल्द गौं सूना होणा छन अर शहरी विस्तार तेजी मा छा रैण खुण बहुमंजिला भवन बण्यां छन। खासतौर पर पहाड़ी जनजीवन खात्मा कि तर्फ बढ़द जाणू छ। लोग गौं छोड़ी मैदांनुद बौगण पर लग्यां छन। अब वो पुंगड़ा जौंमा कबि किसाण कि मेहनत को परिणाम धान्य का रूप मा उत्पादित होंदो छै। वो रूखी अर कराळी उजाड़ धरती कि अन्वार ल्हेकि खड़ा छन। वख हैर्याळी होयां एक अर्सा बीत ग्ये। पर्यावरण तै जैं खेती का चल्द हर्याळी मिल्दी छै अर जै खेती का चल्द धरती मा बरखौ पाणि धारण कनै शक्ति औंदी छै वो आज बंजर अर श्मशान जनि होयीं छ। पर्यावरण का लिहाज से यो सर्वनाश को संकेत छ।
पर्यावरण संरक्षण वास्ता हवा-मिट्टी-अर पाणि को बचाव करे जाणु जरूरी छ। यो संदेश औण चयेणू छ। यांक वास्ता आम आदिमै समझ मा औणू जरूरी छ कि जल-जंगळ-जमीन अगर सलातम छ त वेको अस्तित्व बण्यूं रालो निथर औण वळों टैम यिथगा भयानक होलो कि वेकि कल्पना बि नि करे जै सकदी। ग्लोबल वार्मिंग अर पर्यावरण असंतुलन तैं रोकण मा डालों की महत्वपूर्ण भमिका होंद ये वास्ता डालों का महत्व तैं दिखद हर व्यक्ति तैं डाला लगाण चैंदन। देखे जाव त डाला लगाण का अभियान तैं जनआंदोलन बणै जाण चैंद।
