ब्योकु संकट ! ब्वारी कख छ ?
(दिनेश जोशी ‘अज्ञात दिदा’)
यु सवाल आज हर घर में गूंजण लागी छ।
लौड़ा सयाणा, उमर ढळिगे, पर ब्वारीकु भाग अजूं कख छ?
ब्वै बाबा दिन-रात फिरदा, रिश्ता ल्यूण गाँव-गाँव जांदा।
जखी जांदा, यकु जवाब-
‘सरकारी नौकरी छ कि ?’
सरकारी नौकरी अगर नि छ, त ब्योकु रस्तो बंद समझ ।
चाहे एम.ए., बी.एड., पीएच.डी. हो फेरि किस्मत कु ताळो बंद समझा।
अर अगर नौकरी छ भै, त फेरि अगलि शर्त सुनि ल्यौ -‘देहरादून मा मकान छ ?’
मैं त फेरि रिश्ता भी खतम छ।
गाँवकु खेत, बारी, बाखली, आज कैका मन नि भावदा।
सीमेंटकु फ्लैट देहरादून मं, आज ब्योकु भाग जगौंदा।
सफाई करणी, पौछा करणा, रोजी-रोटी कमौणा छ।
मेहनत करदा नौजवान, फिर ‘काम धंधा नि’ कंहलौणा छ।
दुई प्रतिशत सरकारी नौकरी, बाकी दुनिया बेरोजगार।
फेरि कनकै होलु ब्योकु डोला, जब शतौँ भै अगणित भार।
कति लौड़ा उमर बितौंदा, आँख्यौं में सपना टुटदा।
ब्वै बाबकू मन रोन्दू, घरकु आँगण सूणो छुटदा।
यि दोष कैकु यकुलौ नि, समाजकु सोच बदलणि पड़लि।
मानवता, संस्कार, प्रेम बचोंण तभी घर-घर दीपक जलौण।
धन-दौलत सब क्षणभंगुर छ, सच्चो मन सबसै बड़ो धन।
ब्वारी-नौनू प्रेम से बसदा, तभी धन्य ह्वे जांदा जीवन।
आओ, सोच बदली द्यां सब मिलि, मानवता कु मान बढ़ां।
लौड़ाकु मूल्य नौकरी निं, संस्कार सै समाज सजां।
‘ब्योकु संकट : ब्वारी कख छ ?’
यि प्रश्न मात्र कविता नि छ,
आजुक गढ़वालकु यथार्थ छ-जैकु उत्तर हम सबुतै मिलि खोजणु पडुलू।
