रंत रैबार ब्यौरो…..
रतनसिंह किरमोलिया अंणा-गरुड़ (बागेश्वर)
देहरादून। हमर प्रदेश में आभोव बरसात शुरू हुन हुनै वृक्षारोपण कार्यक्रमों क भौत ठुल अभियान शुरू है जां। उथकै सौणा म्हैण एक पैट हर्याव क त्यार ऐ जां। हमार यां हर्याव क त्यार बटी पेड़ पौध रोपणैकि एक परंपरा रई छु। किलैकि हर्याव क त्यार एक त्यारै नै एक ठुल सांस्कृतिक पर्व लै छु जो हम सबन कैं प्रकृति क संरक्षण क संदेश लै हूं। गौं घरन में आज लै परंपरा छु मड्डुवा क धानाक हौर अनाजाक गाड़ां में मेहवाक हाङफाङपैंटण कि । इथकै इकें % रै है% कई जां। य कैं धन-धान्य धौ-धिनाली और समृद्धि क प्रतीक मानी जाने। हर्याव क त्यारक दिन फल-फूलों दगाड़ डाव बोटों क हाङफाङरोपणै कि लै परंपरा छु। तारीपै बात य छु कि डावबोटों क यूं हाङ फाङ पड्डुरि पौसि जानी और बाद में डाव बोट बणि जानी।
पैलिय क बखत में जब हमार गौंनों
क अगल-बगल तमाम मिश्रित सघन जडोव हई करछी। तब हर्याव क पर्व हुं घरों क आसपास फलदार पेड़ पौधों क और फूलाक पौध लगूणैकि परंपरा जसि छी। सत्तर अस्सी दशक क आसपास जडोवों कैं नुकसान पुजूणकि शुरुआत हुण भै टी । तो माठुमाठ कै नैं तैं बोटोंक कटान हुण भै गोय । जडोव खड़खड़ हुण भै ग्याय। उनर बचाव क दगाड़ वृक्षारोपण कार्यक्रमों कि शुरूआत लै हुण भै गेइ। तब बटी माटुमाठ कै वृक्षारोपण अभियानों ल जोर पकड़ ल्हि। परंतु रोपी डावबोटों कैं बचूणक क्के कारगर उपाय नि सोची ग्याय।
उ तकान गौंक मैसोंक जडोवों दगै आत्मीय लगाव जस लै खतम हुण भै गोय। योई कारण रौ कि हमार तमाम जडोव
माठुमाठ कै खतम है ग्याय। खड़ खड़ है ग्याय। य स्थिति कैं देखि बेर जडोवों कैं बचूणक और वृक्षारोपण कार्यक्रमों क जोर हुण भै गोय। लेकिन शुरू बटी रोपी डावबोटों क बचाव कि तरब लापरवाई क कारण हर साल हजारों डाव बोटों कैं बचाई नि जै सकिणय। आब तो वृक्षारोपण कि
लिजी ठुल ठुल बजट लै उण भैटि गो। वृक्षारोपण क य अभियान ल एक नइ परंपरा जसि बणूण शुरू करि है। अब तो जादातर फोटक खैचूणकि और खबर बात अखबारों में छपूणकि एक होड़ जसि लागि गे। जबकि रोपी डावबोटों क बचूणकि तरब नै ध्यान छु नै रुझान और नै क्वे कारगर योजना। जै क परिणाम छु कि हर बर्ष लाखों डावबोट लगाई जाणई। पर उं धरातल में नजर नि उणाय। बचाई नि जै सकिणाय। बखत बखत पारि जडोवों में लागणी आग य में आग में घ्यू खिदणक काम करनौ। आग लागणै वैल जडोवों कि जैवविविधता कैं भौत नुकसान हुण रौ। आ भोवाक विकास कार्यों क कारण हर साल सैंकड़ों बोट विकास कि बलि चड़ी जांगई ।
रोपी डावबोटों क बचाव नि है सकण भौत सोचनीय विषय छु। य जन शक्ति धन शक्ति और समय कि बर्बादी लै छु। वृक्षारोपणा क यों कार्यक्रम पछिल तीन चार दशक बटी हुनै उणई। ठिक ढडैल मूल्यांकन करी जो तो हर साल हजारों क बजट खर्च करणक बाद लै एक बोट लै नि बचि पौणय। य बात सोचनीय लै छु और शरमैकि लै।
अब जरवत छु रोपी डावबोटों कैं बचूणकि लिजी एक सशक्त तंत्र विकसित करण कि। फिलहाल वन विभाग य मामुल में सक्षम नि देखिणय। यै क लिजी गाँ वालों कैं विश्वास में ल्हिण पड़ल। और उनार दगाड़ मिलि बेर जडोवों क संवर्धन और संरक्षण कि लिजी एक मजबूत तंत्र विकसित करण पड़ल।
जुम्मेवारी गौं वालों कैं सौंपी जाण चैं। यैकि मौनिटरिङ वन विभाग कैं खुद समालण चें। तबै हर साल करी जाणी वृक्षारोपणक फैद छु। नतर फिरि खाओ पियो और गांठि बणाओ वाल किस्स है जाल। यैकि लिजी भल जस मानदेय तै करि बेर य याद धरण छु।
