रंत रैबार ब्यौरो…….
एक शाश्वत सिद्धांत छ कि प्रकृति अपण संसाधनों अर नियम कैदों मा संतुलन बर्णोंकि रखद। एक तर्फ जादा खर्च हवे ग्ये त हैंक तर्फ पूर्ति कैरी अपण नियमों हैं निरेतर क्रियाशील बणैकि रखद, पर यो कब तक जब एक तर्फ संसाधनों को अवैज्ञानिक दोहन होलु त यांक असर हैंक तर्फ वि जरूर पड़लो। अब पेयजल का मामलू हि ल्हे ल्या, जैजगा जै साधन से हमर्तें पीणो पाणि मिल्दु छो वख पाण्यू अभाव नजर औणू छ। अब येकि पूर्ति कख होणी छ यो त जाणकार हि वतै सकदन पर प्रकृति का बर्ताव से साफ नजर औंद कि वो मनख्यों कि दोहन शैली से नाराज छ।
सवाल यो छ लगातार दोहन से पूर्ति को नियम असंतुलित होणु वाजिब छ। होण यो चयेणू छौ कि एक तर्फ हम पाणी संग्रहण य फिर चाल खाळ का माध्यम से बरखा पाणि तै जमीन मा वापसी भेजी वी कि कोख तैं रोचार्ज कर्दा रो। सिस्टम हर साल आहवान कर्द कि बरखों पाणि बचौणो उपार करा पर हम सूणी अनसुना कर दिंदां। नतीजतन अगास बटी धरती मा पड़दी स्वाति बूंद बौगी न दी नाळों बटी सभोदर मा समै जांदन। वो बात अलग छ कि समोदर बटी वाष्पीकरण हवेकि वी चुंद हमतें दुवारा मिल जौंदन पर ये बीच का अंतराल मा हम पाणि का अभाव से ग्रसित हे जंदां। जख तक प्रदेश का पहाड़ी क्षेत्रों कि बात छत वख आज पुराणा पेयजल स्त्रोत सुखद जाणा छन। क्वी जादा टैम नि हे जब चौमासा मा डांडा-डांडा कांठों बटी छोया फुटदा छा। खाळा-गदनों मा बेतहाशा पाणि आँदो छौ। गदना अतरा हे जांदा छा। यख तक कि सिमंदा क्षेत्रों बटी वि छोया फुटदा छा। पाणि कि कमी नि होंदी छै, पर आज स्थिति बिलकुल उलट होयीं छ। पुराणा धारा-पंदेरा सुखणा छन। गौं का लोग आलसी वे ग्येनि। जबकि थोड़ी सि मेहनत कैरी वो सदा चल्न वळा धारा को. गुणवत्ता पाणि ल्है सकदा छा। अब नळकों को पाणि कख बटी औणू छ। वेकि कनि छ अर वो लगातार उपलब्ध होणू हि रालो कि न यीं बात से बेखबर हम सिर्फ कुदरत का अजस्त्र जल भण्डार से दूर होंद जाणा छां।
अब प्रकृति बि संतुलन करो त कख तक अर कथगा। अति दोहन अर वेकि रीचार्जिंग का वास्ता प्रयास नि करे जाण से आज हम पहाड़ का ठण्डा पाणि से वंचित होणा छां। यांक पिछनै हौर वि कथगै कारण छन पर एक कारण यो छ कि हमुन खेती किसाणी कनि छोड्यालि। कबि जौ पुंगड़ा-डोखरों मा खेती कि हैर्याळी फैली राँदि छै वखा रूखा सूखा-भंगार डांडा ह्वे ग्येनि।
हर साल पुंगड़ों मा हळ चल्दा छा। बरखौ पाणि धरती सोख लेंदी छै। जब कबि अतिवृष्टि होंदी छै त यूं पुंगड़ों तैं तर कैरी हि बरखौ पाणि खाळा-गदेरों तक पौंछदो छौ निथर सामान्य बरखा त यूं पुंगड़ा कि तीस हि बुझै सकदी है। खासतौर पर चौमासा कि खेती पर पहाड़ का लोगु जादा आश्रय रैंदो छौ। किलैकि ये हि पाणि से खेती-नाज तैं नमी मिल्दी छै अर बाद मा तेज धाम बि पड़ ग्ये त खेती सुखणै नौबत नि औंदा छै पर चूंकि अब लोगुन हौळ-बळ्दु कि संस्कृति त्याग ये ये वास्ता पुंगड़ा डोखरा पाणि सोख नि सकदा अर पाणि सीधा खाळा-गदनों बटी नयूँ तक पौंछ जांद।
चूंकि धरती रीजर्चा नि ह्वे सकदी ये वास्ता गौं का लोग प्राकृक्तिक स्त्रोतों से मिल्न वळा पाणि से वंचित रै जांदन। जर्वत यीं बातें छ कि पहाड़ का लोग भले ही खेती नि करुन पर अगर पुंगड़ा अर जंगळों दिन मा खास तयार करुन, ताकि बरखौ पाणि यूं चाल-खाळों से धरती मा समै सको। खासतौर पर कुळें अर बांज-बुरांश का जंगळों मा लम्बी-लम्बी खाळ तयार करे नि जावन त निचला क्षेत्रों पर धारा-पंदेरा घट अफ्वी रीचार्ज ह्वे जाला। यानि एक चौमासा बटी हैंकी बसगाळ तक पंदेरों मा पाणि बदस्तूर चल्द रालो।
यांक वास्ता जरूरी कुछ ठोस प्रयास कना होला ताकि बरखौ पाणि रोकी धरती मा समौणे उयार हे सको। यांका वास्ता त एक समग्र आंदोलन कि जर्वत छ। गौं का लोग चूंकि जादातर सर्ग का पाणि पर निर्भर कर्दन ये वास्ता वू कीमती बूंदो को सरंक्षण अर संभरण करे जाण चयेणू छ। अर अगर वो ये महत्व तैं समझ ग्ये त वो दिन दूर नी छ जब पहाड़ को ठण्डों पाणि साल भर बरोबर मात्रा मा उपलब्ध होलु। यिथगै न अगर वो बरखा को पाणि रोकणों बड़ा पोखर य फिर तालाब निर्मित करुन त बूंसे फलोद्यान अर घरबाड़ों कि सिंचै खुण पाणि मिल सकद।
