एक दा गौं कि बेटि-ब्वारि घास ल्याणा खुणि ईड़ाडाँड जयीं हैं। (ईड़ाडाँड हमर इनै मर्चुला-शंकरपुर सड़को मथि जो डांडु च वैखण ब्वल्दि, यो कार्बेट पार्क कु ही अंतर्गत च)
यख कुमौ-गढ़वाल या इन बोलि सकदवाँ कि दुशानै पश्येरी-लखदेती आदि है भीत दूर-दूर बैरी, तब धसै बहुत चौरी हृदि है, आजै तरी न कि कलन पॅचर हीडिगी दोओ घास एक नि निकेल जालु/नमक, नैनीदाँद कि सीमा म त सात गाँ कु बल एक ही पंडेरु छै, हमर दियाँ छै कि पलहाल गाँ त छ छ पर दाळी-बूटी कुछ ना…दादी बवलदी है कि वख एक पिलमोड़ा बुज्या बाना भी लागें है जांद बल छाया अर जैकु वो नासामोद्दु वि रैंदु घई यो चिलमोदु काति वेणु डिल्लु बनक धराद चाद अर तब लखुदु बदल जगंदु छाई
त को घस्पेरि जब जंगल बटि घासौ बिठगा सैकि बाटा म ऐनि त तब तक एक पल्या ऐग्या… एक सौंगुड़ी का बेटि व्यारि छैत जरा-जरा ठठा-मजाक वि हृदि ही घ… वो बिचरि भि हैंसि मजाक म
अपुरु डरैबर भेजि खाण मान बैठगिं कि हमथाभि व्याय म ली जा… डरैबर भि तैयार हेग्गया.. घस्येहूं का अपखुणै पट्टामा फर लिहा कि कैका द्वी ववण्या (रोटि) त कैलू एक लोठ (रोटि) त्यों है… किलै कि फजल फजल त खाणौ टैम छा न जैम, अर सासू और अलग छाइ… पर डीवरन व्यागय रोकि त तब कैरी लगों से खाणकि जिन… सब्यून सरासरि घासा बिठगा ठ्याष म धैर दिन अर अफ भि बैठ गिन, सड़क सड़क त जरसी छा वैका बाद त फिर पैदल ही जाण छाइ.. सब पसेरि जुगराज रै% कु दगड़ अपई निश्छल भासा म डरैबर थे हैंसि-मजाक वळि बत्त सुणांदि सुणांदि भैया उतिरि गैन
क्य अब कहानी म ऐ ट्विस्ट… घस्येरि 10 अर बिठगा 9… ऐ ब्वै यो है!!!!… द्वी-तीन दा गैण दि पर दै.. बिठिगि त १ ही है… अब पल्यूडी पछ्याण त एक ब्यारि कि बिठिगि गैब… सरु बिचरि अफ बैठिगे व्यणा म अर बितिगि रै गै वखि भैय्या म जखम बटि व्यावा म बैठिन,…… सरु कि सासु भि महाखतरनाक !!!… अब क्य होलु ?? सरु
कू रुन्य मुख देखिकि समुन सोचिसोचि।। बड़ मस्किल से त घास कथ्यौं छौ, उड़गा दूर जायां छा भूखा-तीसा विचरि….
अ हाँ…. अब भूख से याद आइ कि पठवा पर एक-द्वी-द्वी बंटा छन लिटयाँ…. एक चस्यैरि न दिमाग दौडै बल इन करला कि यी सह चै यों रवटों खवै घूंला छकैकि… सबि अपड़ा-अपा घंटा द्यो… जदगा या खै सकलि खाण यो छकैकि… अर जदगा बचि जाला हम खै धूलां बॉटि-चूटि कैा पर खबरदार सरु घौर जैकि कुछ न खै… किलै कि तेरि सासु म हम ब्यलला कि तेरि ब्यारि थे भरि शूल-पीड़ा/डी/पेटदर्द हुणू छाइ… इलै तु तीन बेळि बंटा अवि खा…. धौर नि खाणु कुछ सरु न भि जदगा पच्येलि सकिन… पच्येलि दिन रोटि.. बकि हौरि चस्येयूँ न निमा दिन।
अब गुठयार म पउची हैगी डांस सुरु…. सरु की छकैकी रोटी बांकी लहुरदा धामीं है… बल हे मोरी ग्यो दे न… अर होरी भूखी/अधप्यति घसेरी बवनी जी!! रि तुम व्यारी चै
म्वरी-म्वरी यचै कि ल्पयों हीं हम.. भारै अपड ब्वारि जिंदगी देखा… यों के त आज घास भि नि कट्या जम्मा ना… अर हम ले कटदा त कख बटि बगों घास ही नौच… वो तमाम गड्वलण काटी लीं गिन…. अपखुणै ही चार-चार पूछि बड़ मुस्किल से मिलिन हमथै… फिर अपर्डी सासु-रौळा डैर भि है.. ब्वलदि कि सरु थे त डी हुयूँ रै होलु पर तुमथै.. गुरौ धड़कयूँ छौ किजो तुम सिदगा कम ल्याँ धासा
बस इदगा सुनैकी सरु सासु त बखयै गे… वा लोकाचार कि लै त हैं च, बवारी है धौर अपड़ा स्वामी जी च देखिकी बरदत त करन ही बैठगे… हमखां ही धरी रै होली या दुखः कुटरी, लोखु व्यारि क्य गडौळा/चिटगा सयान घास का अर एक ह्याचारी अलवेली…।!!इन कैन नि दयख कि होरी घरै भूखी रैणु, कम खाणु आइडिया करी पर एक-एक क्वेरी घास दीनू आइडिया नी हे ऊंचे… हे रे पासा।। तेरी आसा !
जीआर
