रंत रैबार ब्यौरो…..
हिमालय दगड़ि छेड़छाड़ कु ही नतीजा छ ज्वा नेपाल मा तबाही हूं हमतें फिर सि सोचण पर मजबूर कर्द कि हिमालय दगडि छेडछाड़ ट नी छ। नेपाल की य घटना हमरा वस्ता बि एक चुनौती छ। हम 3 सुरक्षित रैण चंदा त महतै हिमालय तै समझणु होलु।
हाल का सालों म हिमालय म हुई घटना य बात बताणै छन नियंत्रित विकास ही सुरक्षित रास्ता छ। यानि आज का विकास कार्यों अण वला कल कि समग्र चिंता शामिल होण चैंद विश्व पर्यावरण वार हिमालय सरोकारों तैं समझण जरूरत छ। हिमालै क्षेत्र कि विकट भौगोलि बनावट होणा कारण योजनों तैं असल रूप मा अमली जामा पैरौणो धरातलं प्रयास होण चयेणान।
दरसल हिमालै कि महत्ता अर उपयोगिता को बखान कन से वो बलव नि बणन्या यांखुण घरातल पर सकारात्मक प्रयास होवन तभी सार्थकता बि आज हिमालयी राज्यों कि धरती ठोस नि रैकि पोली ह्वे ग्ये। यांको उदाहरण यूं राज्यों मा औण वळि बादल फटण य फिर भू-स्खलन कि बेशुमार घटन
जाणकार बतौंदन कि हिमालै को दक्षिणी हिस्सा अबि निर्माण कि प्रक्रि सि गुजरणू छ। ये वास्ता वो अतिवृष्टि अर बादल फटण जनि घटनों सि पै होण वळि विषम परिस्थितियों तैं नि झेल सकणू छ। सवाल यो पैदा होंदवि ये क्षेत्र तैं दैवी आपदों सि कनुक्ने बचै जाव। मानसून जो कि चौतर्फा निर्मा अर आनन्द को रैबार ल्हेकि औणो प्रतीक छ पहाड़ी क्षेत्रों मा आज वेर्तें आतंव को पर्याय समझी चले जाणू छ। वर्ष 2013 कि वो त्रासदी जैका कारण केदारघाटी मा महा जल प्रलय ऐ ग्ये छौ। तबा मुक्तभोगी आज तक वे दर्द तैं बिसरि सक्य। वूर्ते हर बसगाळ कि शुर्वात मा हि डर सतौण बैठ जांद वि खबनी कख यिनि कुछ अनहोनी नि ह्वे जाव। क्षेत्रीय यो डर बि अकारण नी छ वखै जलवायु अर धरती-मिट्टी आदि का प्रकार से वूसि जादा क्वी नि जाण् सकदो।
हर साल हिमाचल प्रदेश अर उत्तराखण्ड का पहाड़ी क्षेत्रों मा औण वरि दैवी आपदा शैद यी रैबार देणी छन कि हिमालै कि सेहत ठीक नी छ। वो अफुतै समाळि नि सकणू छ। ये साल बि दर्जनों जगा बादळ फटणै घटनों न बतौ दये कि अबि बि क्वी-यिनि करनी करा कि जांसे हिमालै तँ दरकण से बचै जै सकु। जम्मू कश्मीर से ल्हेकि सुदूरपूर्व का हिमालयी राज्यों की कमोवेश यी हालत छ । यख बि तमाम विकास कार्य हिमालयी कोप का शिकार होणा छन। दरसल यांक वास्ता शैद यूं राज्यों को होंदो शहरीकरण अर बंजर होंदी खेती वळि जमीन जादा जिम्मेदार छ। बरसातों मा होण वळा व्यापक भू-क्षरण का कारण वखै धरती ढलवां होणै तेज प्रक्रिया से गुजरणी छ। यी वजै छ कि वखा धारा-पंदेरा सुखणा छन। बारों मैना तुलबुल ह्वे कि बगदी पहाड़ी नद्यों मा अब पाणि सिर्फ नदी बोनो धर्म निभौण तक सीमित ह्वेकि रै ग्ये। धरती पेणी नी छ। वो जख भैर बटी बंजर होणी छ वखि भितर बटी वींकि छाति सूखी अर तिसाळी छ। यिनि स्थिति मा क्य सरकारों अर यांसे जुड्यां जाणकारों तैं नि बतौण चयेंद कि यांखुण क्य उयार करे जावन। जाणकार बि यी बतौंदन कि जब तक हिमालै कि धरती मा हर्याळी कि बिज्वाड़ नि बुतै जांदि तब तक वेको क्षरण होंद रालो।
हिमायली धरती को निरंतर क्षरण यीं बात से नपे जै सकद कि वेकि कोख बटी निकळदी नदी कम से कम चौमासा का तीन मैना मटलोट वेकि चल्दन। करोड़ों क्यूसिक पाणि मा माटु छळेकि हिमालै बटी गंगा सागर मा समै जाणू छ। हिमालै कि सेहत पर तकरीर कन वळा वैज्ञानिक य फिर पर्यावरणविद ये मामलो मा चुप छन। वो यां पर चुप लगैकि चल्न मा हि खैर समझदन। शैद धरती कि परिभाषा गढ़न वळा वैज्ञानिकों मा बि यांको क्वी जवाब नी छ कि गंगा-यमुना-ब्रहमपुत्र जनि विशाल जलराशि ल्हेकि चल्ना दौरान माटु ल्हेकि जाणी रैंदन वेको क्वी हल बि छ कि न वास्तव मा हिमालै भारत भूमि का वास्ता एक सजग अर अटल प्रहरी मा रूपमा खड़ो छ।
हिमालय ग्लेशयरों कु पिघलणु विश्व एक भू-भाग तें प्रभावित कन्न वलि घटना छ। हमतें पर्यावरण की कीमत पर विकास नि कन्न चैंद। सतत विकास वास्ता वसुधैव कुटुम्बकम की भावना सि काम कन्न होलु।
