रंत रैबार ब्यौरो
मालु का पत्तों का प्रयोग अबि तक पहाड़ों मा पत्तल अर दोनों का रूप मा होंद औणु छौ पर प्लास्टिक, क्राकरी औण से मालु प्रचलन से भैरे चल ग्ये।
दरसल हम अपणि समस्यों को समाधान अपण आसपास मौजूद संसाधनो मा तलाश नि कैरी भैर बटी क्वी विकल्प तलाश कर्दा। यो जख महंगो होंद वखि वेकि गारंटी बि ववी ल्हेणो तयार नि होंदो। पर अगर मालु का परिप्रेक्ष्य मा विचार करे जाव त वो जादा हथबुत्य अर गारंटी वलों समाधान छ। हालांकि अबि बि पहाड़ों का रिमोट क्षेत्रों मा मालु का पत्तों से बण्यां पत्तल, दोना, जना साधन इस्तमाल करे जांदन पर थोड़ा तथाकथित आधुनिक क्षेत्रों मा ये विकल्प तैं पिछड़ापन कि निशाणी समझे जांद। पर मालु अपण आप मा सुरक्षित अर सरलता से उपलब्ध होण वलों संसाधन छ। अर अगर चलन मा अग्ये त वखा लोगु खुण यो एक कुटीर उद्योग को रूप अख्तियार कर सकद।
मालु पत्तों कि उपलब्धता चूंकि सालभर वे सकद। अर अगर उद्योग का रूप मा प्रचलित हवे ग्ये त क्षेत्रीय लोगु तैं सालभर कच्चु माल उपलब्ध हवे सकद। यानि मौसमी नि वेकि मालु सदाबहार संसाधन का रूप मा उपलब्ध हवे सकद। पहाड़ मा गर्म घाटी क्षेत्रों मा मालु का लगुलो से भर्या जंगल व्यखणों मिल जांदन। वुन मैदानंद मालु तैं ग्वीराल (कचनार) का रूप मा द्यखे जांद पर यूं द्विय वनस्पत्यों मा भारि अंतर छ। ग्वीराल का डाला होंदन जबकि मालु लता (लगुला) का रूप मा होंद। ग्वीराल का पत्ता भले ही मालु जना होंदन पर मालु का पत्ता आकार मा ग्वीराल से कई गुणा’ बड़ा अर खूबसूरत होंदन।
ग्वीराल पर पत्रों कि उपलब्धता मालु का मुकाबला भौत कम होंद। य बात पहाड़ को मन्खि ही बींग सकद। मालु उत्तराखण्ड का अलावा पंजाब, मध्य प्रदेश, सिक्किम अर पूर्वात्तर राज्यों का जंगली इलाकों मा उपलब्ध होंद। य बात अलग छ कि मालु उत्तराखण्ड मा एक उपेक्षित अर अनाम वनस्पति का रूप मा पछ्यणे जांद। पर अगर 40-50 साल पैल्ये बात करे जाव त शादी-ब्यो, बरसी तरैई, मण्डन आदि छवटा-बड़ा आयोजनों का टैम पर हफ्ताभर पेलि बटी मालु का पत्तल दोना आदि तयार करे जांदा छा। गौं भर का बड़ा बुजुर्ग कार्यक्रम आयोजनकर्ता का घर मा ऐकि पत्तल-दोना (पुड़का) बणौणु शुरू कर देंदा छा। यांसे जख गौं मा भयात तैं प्रोत्साहन मिल्दो छौ वखि आयोजकों तैं भैर बटी क्राकरी को इन्तजाम नि कन पड़दो छौ। मजा बि बात या छ कि जै पत्तलों मा खाणु खाये जांद तब वो फुंडु धोल दिये जांदन त वेर्तें गोरू बड़ा चाव से खै जांदन। किलै कि वृं पत्तलों मा लूणनाज अर हरापन को सवाद होंद ये वास्ता वो गोरू खुण दावत को पर्याय बण जांद। यानि न सिर्फ मालु पर्यावरण मित्र छ बल्कि आसानी से उपलब्ध होण वलो घर्य संसाधन बि छ। आज जबकि पूरा विश्व मा प्लास्टिक का खिलफ अभियान चलै जाणू छ। पर्यावरण का जाणकारी चेतावनी देणा छन कि कुछ बि करा पर प्लास्टिक का इस्तमाल बंद करा त यिंनि स्थिति मा मालु का पत्ता एक उपयोगी साधन साबित ह्वे सकद।
मालु औषधीय गुणों से भरपूर होणा अलावा शुद्ध पर्यावरण मित्र छ। येका उत्पादों का इस्तमाल मा क्वी साइड इफेक्ट को खतरा नी छ। यी वजै छ कि हमारा धार्मिक ग्रंथों मा मालु तैं शुद्ध अर शुभ मने ग्ये। जर्वत यीं बातै छ कि प्रदेश सरकार कि तर्फ ध्यान दिये जाव। यानि अगर सरकारी प्रोत्साहन अर संरक्षण मिल जाव त मालु न सिर्फ उत्तराखण्ड बल्कि व्यापक स्तर पर शुद्ध पर्यावरणीय संसाधन कि अन्वार ल्हे सकद। यांसे पूरा देश क्य विश्वभर मा एण्टी प्लास्टिक ऑप्शन का रूप मा मालु कि पछ्याण बण सकद।
