(सरोज शर्मा)
द्रौपदी जैंथै कृष्णा,पांचाली, और यज्ञसेनी भि बोले जांद, भारतीय महाकाव्य महाभारत कि मुख्य महिला पात्र च,वा पांचाल साम्राज्य कि राजकुमारी और पांच पांडवों युधिष्ठिर,भीम, अर्जुन, और नकुल सहदेव कि पत्नि च,
1-वा अपणि सुंदरता,साहस और बहुपत्नी ब्यो खुण प्रसिद्ध च।
2- द्रौपदी और घृष्घुम्न पांचाल राजा द्रुपद क आयोजित यज्ञ न पैदा हुंयी। द्रौपदी क ब्यो स्वयंवर प्रथा से ह्वै, अर्जुन ल द्रौपदी थैं स्वयंवर म जीति, मां कुंती कि गलतफहमी क कारण कुंती थैं सभि भाइयों कि पत्नि बणण पोड़ि।
बाद मा युधिष्ठिर क राजसूय यज्ञ कन से और सम्राट क दर्जा मिलण से वा इंद्रप्रस्थ कि महारानी बणि। वीं का पांच पुत्र छा,सब्या पांडवों से एक,एक जौं थैं उपपांडव बोले जांद छा।
3- द्रौपदी क जीवन कि सर्वाधिक मुख्य घटना कुरू दरबार म जुआ खेलण क टैम घटित ह्वै।ये खेल म अपण सर्वस्व गंवाण क बाद युधिष्ठिर न द्रौपदी थै भि दुर्योधन क हाथों दांव पर लगै द्या और हार ग्या।
द्रौपदी थै मासिक धर्म क टैम दुशासन न लटला पकड़िक घसीट। दुर्योधन और वेका सहयोगी कर्ण क द्वारा अपमानित किए जांण पर भि वींन वूंक बोल्यूं नि मानि और अपथैं दांव पर लगांण कि वैधता थैं चुनौति द्या। और जब दुशासन न वीं क वस्त्र हरण कु प्रयास करि त वींक सम्मान चमत्कारी रुप से सुरक्षित रै किलै कि वींक वस्त्र अंतहीन रुप से फैल ग्या,ये चमत्कारी काम कु श्रेय श्रीकृष्ण थैं दिये जांद, श्रीकृष्ण थैं द्रौपदी क सखा भि बतये जांद।
पांडवों क तेरह साल वनवास क टैम द्रौपदी वूंका दगड़ ही रै और वनवास का अंतिम टैम म मत्स्य कि राणि सुदेशना कि दासी बणिक अज्ञात वास म रै। मत्स्य सेनापति कीचक से दुःखी ह्वैकि वींन भीम से मदद मांगि और भीम न कीचक कु वध कैर द्या।4- वनवास क बाद द्रौपदी न कुरुक्षेत्र क युद्ध देखि,जैका परिणाम स्वरूप वींका पिता भाइयों और पांच पुत्रों कि मृत्यु ह्वै ग्या।
युद्ध क बाद छत्तीस बरसों तक वा कुरु कि महारानी रूप म अपणि भूमिका निभै। महाकाव्य क समापन मा द्रौपदी न पांडवों दगड़ अपणि स्वर्ग कि अंतिम यात्रा शुरू करि, सबसे पैलि द्रौपदी हि गिर।
5- द्रौपदी कि कहानि बनि बनि कि कलाओं प्रदर्शनो और माध्यमिक साहित्य खुण प्रेरणा क श्रोत च।देवी क अवतार क रुप म प्रमाणित, द्रौपदी पंचकन्या क रुप म सरहे जांद जु महिला शुद्धता क आदर्श च,जौं का नाम सुनण से हि पाप दूर ह्वै जंदिन।
6- उपमहाद्वीप क कुछ हिस्सों मा एक संप्रदाय च जु वीं देवी क रूप म पुजद।
7- व्युत्पत्ति और विशेषण
द्रौपदी क शाब्दिक अर्थ द्रुपद कि पुत्री जु पितृनाम च जु द्रुपद शब्द से लिए ग्या जैकु अर्थ स्तंभ च। और भि महाकाव्यों मा वीं थै क ई नामों से संबोधित किए ग्या वींका अन्य नौ कृष्णा यानि कि कालु रंग, पांचाली, यज्ञसेनी,यानि कि यज्ञ से पैदा हुयीं,सैरंध्री एक कुशल दासी यु छद्म नौ अज्ञात वास क टैम रखि।
परशती या पृशती ई नौ द्रुपद क पिता पृशत से लिए ग्या।
मालिनी सुगंधित माला बणाण वलि।
पंच वल्लभ पांच पांडवों कि प्रिय।
पांडु शर्मिला पांडु कि ब्वारि।
द्रौपदी कि जन्म कथा
द्रौपदी क जनम कि कहानि क सारांश
हजारों साल पैल राजा द्रुपद और आचार्य द्रोण एक दुसरा क दुश्मन छाया।दुव्यिया एक दुसरा थैं हराण कि कोशिश म छा पर इन नि ह्वै सक।राजा द्रुपद न शक्तिशाली और भयंकर पुत्र कि कामना खुण यज्ञ क आयोजन करि जु द्रोण थै मार द्या।
वूंन पुत्र प्राप्ति खुण द्वी ऋषियों से यज्ञ कनकु बोलि।
जब ऋषियों न यज्ञ पूरु करि त वूंन सब्यों थै प्रसाद द्या। जब वु राजा द्रुपद कि पत्नि थै प्रसाद दींण कु गैं त वींक गिच मा पैलि बटिक कुछ छा, इलै वूंन प्रतीक्षा कनकु बोलि।
ऋषियों थै ये बात पर क्रोध ऐ गे।
सबसे पैल याज नौ का ऋषि न प्रसाद अग्नि म डालि। और वीं अग्नि से एक ज्वान योद्धा परकट ह्वै,उपयाज नौ का एक हौर ऋषि न भि प्रसाद अग्नि म डाल द्या त अग्नि से एक भौत ही रुपवती स्त्री प्रकट ह्वै।
जनि वा अग्नि से भैर ऐ त आकाशवाणी ह्वै कि यीं स्त्री कु जनम बुरै कु विनाश कनकु हुंयू च।
या महिला बाद म राजा द्रुपद कि पुत्री क रूप म प्रसिद्ध ह्वै। और युवा योद्धा क नौ घृषटधुम्न ह्वै।
द्रौपदी स्वयंवर
जै टैम पांडव एकचक्रा नगरि म बामणों क वेश मा जीवन बिताणा छा,वूं दिनों हि पांचाल नरेश कि कन्या द्रौपदी कि स्वयंवर कि तैयारी हूणि छै। एकचक्रा नगरि क बामणों क झुंड न पांचाल देश खुण रवाना हुईं।पांडव भी वूं क दगड़ हि ह्वै गिन। पांचों भै माता कुंती दगड़ कै कुम्हार कि झोंपड़ी मा टिक गेन,बामणों क वेश मा हि छा वु।ये कारण क्वी वूंथै पछ्याण नि सक। स्वयंवर मंडप मा भौत बड़ धनुष रखयूं छा, और काफि ऊंचै मा एक सोना कु माछु टंग्यू छा।वेक ताल एक चमकदार यंत्र तेजी से घुमणु छा। राजा द्रुपद न घोषणा करीं छै कि जु राजकुमार पाणि म प्रतिबिंब देखिक वै भारी धनुष से तीर चलैकि माछा क आंखा बेध द्यालु वै हि द्रौपदी वरमाला पैरालि।
ये स्वयंवर खुण दूर दूर बटिक अनेक वीर अंया छा।मंडप मा सैकड़ों राजा इकठ्ठा छा जौं मा धृतराष्ट्र का सौ पुत्र,अंग नरेश कर्ण, श्रीकृष्ण, शिशुपाल, जरासंध आदि भि शामिल छाया।
दर्शकों कि भारि भीड़ छै। राजकुमार घृषटधुम्न घ्वाड़ा म सवार ह्वै कि अगनै अगनै ऐ पिछने हाथी म सवार द्रौपदी ऐ।हाथों मा फूलों क हार लेकि राज्यसभा म पदार्पण करि।
राजकुमार घृषटधुम्न अपणि भैणि क हथ पकड़िक मंडप ल्या।
ऐका बाद एक एक कैरिक सभि राजकुमार धनुष कि डोरि चणाण कु असफल प्रयास कैरिक अपमानित ह्वैकि अपणि जगा लौट गेन।कतगा हि सुप्रसिद्ध वीरों थै मुख कि खाणि पड़ि। शिशुपाल, जरासंध, शल्य, और दुर्योधन तक सभि असफल ह्वै गिन। जब कर्ण कि बारि ऐ त सभा म लहर दौड़ ग्या, सब्यूं न सोचि अंग नरेश जरुर सफल ह्वै जाल। कर्ण न धनुष उठै कि खड़ भि कैर द्या और प्रत्यंचा भि चणांण लगि थ्वड़ि सि कसर छै कि धनुष क डंडा वैक हथ से छुट ग्या और उछलिक वेक मुखकन मा लगि अपणि चोट सलांदा सलांदा वु अपणि जगा म बैठ ग्या।(एक कहानि इन भि च कि द्रौपदी न हि सारथी अधिरथ क पुत्र से ब्यो कन से मना कैर द्या) इतगा म बामणों क बीच मा बैठयूं रुपवान नौनु उठि त सभा म खलबली मच ग्या,लोगूं मा बनि बनि कि चर्चा हूंण लगि।तब बामण वेशधारि अर्जुन न धनुष म डोरी चढै़ कि धनुष म तीर चढै़ द्या। और तुरंत हि बाण न निशाना साधि क सटीक जगा पर लगै ध्या, लोग द्यखदा रै गिन,सभा म कोलाहल मचि ग्या बाजा बजण लगीं।
वै बगत राजकुमारि कि शोभा द्यखण लैक छै वींन प्रसन्न ह्वेकि और शरमै कि बामण रुपी अर्जुन क गौल मा माला पैरा द्या,माता कुंती थैं समाचार दींण कु युधिष्ठिर नकुल सहदेव मंडप से चल गेन,भीम नि ग्या किलैकि वै डौर छै कि कखि निराश राजकुमार अर्जुन थै कुछ नि कैर द्या। भीमसेन क अनुमान ठीक ही निकल।सभि राजकुमारों मा हलचल मच ग्या वु शोर मचाण लगीं ई हाल देखिक श्रीकृष्ण बलराम और कुछ राजा उपद्रवियों राजकुमारों थै समझाण लगीं,ऐ बीच भीम और अर्जुन द्रौपदी थै लेकि कुम्हार कि कुटिया म जाण लगीं त घृष्टधुम्न चुपचाप वूंक पिछने पिछने ग्या कुम्हार कि कुटिया म जु वेन देखि त वेकि आश्चर्य कि सीमा नि रै वु तुरंत लौट ग्या और अपण पिता से बोलि कि मी लगद कि ई कखि पांडव नि ह्वा। जब द्रोपदी वे बामण कि मृगछाला पकड़िक जाणी छै त मी भि वूंका पिछने ह्वै ग्यूं वु एक कुम्हार क झोपड़ा म गैं वख एक तेजस्वी देवी बैठीं छै वख जु भि बात ह्वै वे से मी विश्वास च कि वा कुंती ही च।
तब द्रुपद क बुलावा से पांचों भै कुंती क दगड़ राजभवन म पौंछीं। युधिष्ठिर न राजा थै सही परिचय द्या ई सुणिक कि ई पांडव छन त राजा अति प्रसन्न ह्वै वूंकि इच्छा पूरण ह्वै महाबली अर्जुन मेरि बेटि क पति ह्वै गे अब मी द्रोणाचार्य कि शत्रुता कि चिंता नि रै,ई विचार कैरिक वूंन संतोष कि सांस ल्या मां कि आज्ञा से सभि पांडवों क ब्यो द्रौपदी से ह्वे गे।
