(लिख्वार -. विश्वेश्वर प्रसाद सिलस्वाल)
श्रीमान जी -आज राति क्या पकाणि छै.
श्रीमती -भर्ता.
श्रीमान जी – हे ब्वे कन मोरि फिर आज..
श्रीमती जी -अरे डेरो ना जी, आज तो बैंगन का भर्ता बणाणु छौ,तुम क्य सुचणा.
श्रीमान जी -त्यार क्य भरासु.. त्यार आँख तो हमेशा मिते इनि दिखणा रेन्द जन कसे बाखरु..ते..
श्रीमती जी- तबि पहुंचणा छवा सत्तर पर अब. हौर क्वि जनानी हुन्द तो कैदिन बणे दिंद तुमार भुर्ता. ये आदिम जन आज तक मिन केकु पति नि द्याख.
श्रीमान जी -अच्छा अब तेरी नज़र दुसरुक मरद पर हि रैद.
श्रीमती जी-आफ जणी समझयूं मिते.
श्रीमान जी- कैसे बोल सकती हो, तुम मेरे लिए ऐसी बात..
श्रीमती जी -बस ह्वे गे ना असमान आँखि तैड. वू तो अभि अंग्रेजी नि…
श्रीमान जी -अच्छा अब तो मि खुणी शराबी भि बुलणी छै.. खबरदार जो एक शब्द आगे बोला नहीँ तो कहीं भुर्ता…
श्रीमती जी- ये आदिम दगडी तो बात करण भि बेकार. तुमार तो काम ना काज मि जरा लहसुन, मिर्च अर मटर छिल्दु भुर्ता मा खुणी..
