रंत रैबार ब्यौरो……
उत्तराखण्ड हि न देश का तमाम राज्यों मा पेयजल कि किल्लत आम छ। ये मामल मा जादातर देश भूजल को दोहन कैरी अपणि रोजमर्रा कि जर्वत पूरी कर्दन। सरकारी आंकड़ा बतौंदन कि बैंगलुरू, चेन्नई, पुणे, शिमला अर दिल्ली समेत देश का गौं-कस्बों मा बि पेयजल अर सिंचै खुण भूजल पर निर्भरता छ। यानि सालाना 250 अरब घन मीटर भू जल निकळून ल्हेकि भारत वीं सूची मा सबसे ऐंच छ। य बात नी छ कि देश मा जल संग्रहण अर पेयजल का संसाधनें कि कमी हो पर बढ़दी आबादी अर कल काराखानों का इस्तमाल कि मात्रा बढ़न से यि सर्य संसाधन कम हि पडणा छन। आंकड़ा बतौंदन कि तालाबों अर बावड्यूं कि संख्या घटी साढ़े पांच लाख रै ग्ये। यांक पिछनै कारण बतै जांदन कि यिं ताल तलैया य तालाबो को अतिक्रमण कैरी लोगु वख ईट-सीमेंट का जंगळ खड़ा करयालिन।
विषम भौगोलिक संरचना वळा राज्य उत्तराखण्ड मा जें गति से भूजल उंदो अर हौर उंदो होद जाणू छ यो चिन्ता कु विषै छ। प्रदेश सरकार कोशिश मा लगीं छ कि प्राकृतिक जल स्रोतों तैं पुनर्जीवित कनौ अभियान चलै जाव। सरकार कि य सोच सराहनीय छ पर सोच रखण मात्र से क्वी उद्देश्य प्राप्त नि ह्वे सकदो। यांखणु सरकार अर सरकारी मशीनरी कि इच्छा शक्ति कि भौत जर्वत छ।
हर साल करोड़ों का बजट बणद खर्च होंद। कथगै ताल तलैया, चाल-खाळ पुर्नजीवित करे जांदन अर समझा कि चूंकि कोशिश जाया नि गयी। वुन द्यखे जाव त पहाड़ बहुल उत्तराखण्डी लोग जणदा छन कि बरखा पणि तैं कै तरीका से संचयित करे जै सकेंद। यखै परम्परा छ पहाड़ का जंगळों अर वीरानों मा जलस्रोत डेवलप करे जाव। अगर गाँ मा जाकि प्रचार करे कि तुमन अपणा धारा पंदेरा ज्यूंदा रखणन त वर्षाकाल तैं भूमिगत कना उयार करा। तब बूंन तकरीबन हर गौं मा बड़ा-छ्वटा पोखर अर चाल-खाल बणैकि बरखौ पाणि भूमिगत कनै संस्कृति तयार करे जाव। पर जब बटी पहाड़ पर कैंसर रूप मा पलायान को रोग लगि वो तमाम पोखर, चाल-खाळ, सुखी भंगल्ट बण ग्येनि। पहाड़ों म चाल-खाळ को कॉन्सेप्ट यीं बात हैं ल्हेकि छौ कि अगर जंगळ मा गोरू चनौ जाला त वृतैं वखि पीणो पाणि मिल जालो। कम से कम बरसात मा लबालब जलापूर्ति चाल-खाळ एक साल तक गौर बखरों खुण पाणि कि व्यवस्था का साधन रैला। पैला टैम मा विषम ढलान अर पथरीली जमीनों का बावजूद क्षेत्रीय लोग अपण गौं का औरा-धौरा यिनि खाळ य पोखर बगँदा छा जांसि तूं खुण पेयजल समस्या पैदा नि होंदी है। कालांतर मा पहाड़ का यो कॉन्सेप्ट खत्म ह्वे ग्ये। आज बूं पोखरों अर खाळ्यूं मा लैंटान कि झाड़ पैदा होयीं छ। य बात अब इत्सास का पन्नों माय फिर पुराणा लोग्वी कथा-किस्सों का हिस्सा बणी रै ग्येनि।
द्यखे जाव त पहाड़ बटी बेहतासा पलायन का कारण यूं पोखरों, नवळों, धारा-पंदेरों अर चाल-खाळों को इस्तमाल कम ह्वे ग्ये। लोग खेती-किसाणी नि कैरी राशन कि दुकान्यूं पर निर्भर हवे ग्येनि। अब जर्वत यीं बातै छ कि सबसे पैलि पलायन पर चोट करे जाव। अर प्राकृतिक जल स्रोतों तैं पुनजीर्वित कन्न का काम तैं इमानदारी सि करे जाव तबि हमरा धार-पदेरा हर्चणा सि बचि सकदन।
