गीतकार गायक स्व. जीत सिंह नेगी अर गोपाल बाबू गोश्वामी याद करे गैन….
नई दिल्ली। कुमाउनी भाषा, साहित्य एवम् संस्कृति समिति (पंजीकृत) दिल्ली द्वारा दिल्ली का गढ़वाल भवन मा गीतकार जीत सिंह नेगी जी अर गोपाल बाबू गोश्वामी जी की जयंती की पूर्व संध्या फर याद करे गैन. (जन कि सबु थें पता च कि गीतकार अर गायक स्व. श्री जीत सिंह नेगी जी कु जन्म 2 फरवरी 1925 अर स्व. श्री गोपाल बाबू गोश्वामी जिकु 2 फरवरी 1949 खुणि बताये जांद). ये कार्यक्रम मा द्वी महान विभूतियों थें याद करे गे और श्रद्धांजलि दिए गे. यांका अलावा ये कार्यक्रम मा कुमाउनी भाषा साहित्य संगोष्ठी अर कवि सम्मेलन कु बि आयोजन करे गे.
कार्यक्रम कु प्रथम सत्र मा कुमाउनी भाषा साहित्य संगोष्ठी मा भाग लीण वळा वरिष्ठ साहित्यकार सर्वश्री पूरन चंद्र कांडपाल जी द्वारा देश की आजादी मा कुमाउनी लोगोंक अर साहित्य कु कथगा योगदान रै वे फर ऊँल बिस्तृत जानकारी दे. रमेश हितैषी जी द्वारा कुमाउनी परम्पराएं , त्यौहार अर साहित्य फर विचार धरद बोलि कि कुमाउनी परम्परा भौत पुरणि छि जो त्यौहार अर कै रीति रिवाजों का रूप मा देखणकु मिलदी। कुमाउनी साहित्य का बारा मा ऊँल बोलि कि कुमाउनी कु साहित्य समृद्ध च. जैमा महाकाव्य, खण्डकाव्य, कहानी, नाटक, कविता, गजल, गीत, शब्द कोष, डायरी, रिपोर्ताज, साक्षात्कार, यात्रा वृतांत, जीवनी संग्रह, ब्याकरण से अलाव बि भौत विधाओं मा साहित्य मौजूद बि च अर लगातार लेखि बि जाणूंच। वरिष्ठ पत्रकार श्री चारु तिवारी जिल अपण वक्तव्य मा बोलि कि लोक जागर अर सांस्कृतिक कार्यक्रम बि हमरि संस्कृति का अभिन्न हिस्सा छि पर यांका अलावा संस्कृति कि अन्य विधा बि छिं जौं थें बचाणकु प्रयास हूँण चेंद। वरिष्ठ रंगकर्मी श्री मनोज चंदोला जिल कुमाउनी फिल्म्स विकास यात्रा फर अपणि बात रखि अर बोलि कि आज फिल्म बि उत्तराखण्ड की पृष्ठ भूमि फर बनणा छिं जो नै पीढ़ी का वास्ता धरोहर का रूप मा याद करे जाला। योगाचार्य श्री रमेश काण्डपाल जिल योग अर धर्म का कुमाऊ से संबंध मा बात रखि. ऊँल बोलि कि योग से हम अपण तन का दगड़ दगड़ मन अर व्यवहार थें बि स्वस्थ रखि सकदन। वरिष्ठ साहित्यकार श्री नीलाम्बर पाण्डेय जिल कुमाउनी भाषा शब्द और उत्पति का बारा मा विस्तृत जानकारी दींद बोलि कि कुमाउनी भाषा कि शब्द सम्पदा भौत समृद्ध च बस वे थें सहेजणकि जरवत च.
कार्यक्रम कु दुसरु सत्र कवि सम्मेलन छौ. ये कवि सम्मेलन मा प्रतिभाग करण वळा कवि सर्वश्री हेम पंत, ओम प्रकाश आर्या, कुंदन सिंह उजराड़ी, बहादुर सिंह बिष्ट, बी एस बिष्ट ‘ दीपक ‘, प्रेम सिंह नेगी, जगदीश चंद्र तिवारी, सुश्री चंपा पांडे, किरन पंत, हेमा हर्बोला, डॉ नवीन जोशी, के. एन. पांडे “खिमदा”, सुधीर पंत समेत कै नया कवियोंल कविता पाठ करि. येका अलावा कै अन्य लोगोंल बि ये वार्ता अर काव्यपाठ मा भागीदारी करि।
ये दौरान वरिष्ठ साहित्यकार श्री पूरन चंद्र काण्डपाल जी द्वारा रचित कुमाउनी किताब “तुतुरि” कु बि लोकार्पण ह्वे। या किताब ख़ास कर नै पीढ़ी का वास्ता अपणि दुदबोलि कुमाउनी भाषा शिखौण का वास्ता लिखे गे. ये किताब कु संपादन समिति का अध्यक्ष श्री सुरेंद्र सिंह हालसी, महासचिव राजू पांडे अर कोषाध्यक्ष कुंदन भैसोड़ा द्वारा करे गे। 40 पृष्ठ अर 50 रुप्या कीमत का दगाड़ या किताब कुमाउनी भाषा, साहित्य एवम् सांसकृतिक समिति (पंजीकृत) दिल्ली द्वारा प्रकाशित करे गे .
ये कार्यक्रम मा मुख्य अतिथि का रूप मा उत्तराखण्ड सरकार मा मुख्य स्थाई अधिवक्ता सी. एस. रावत जी का आलवा समाज सेवी, रंगकर्मी, लेख्वार अर गायक बि मौजूद छ्या। जैमा फिल्मकार संजय जोशी, संगीतकार राजेंद्र चौहान, राहुल सती, महेंद्र लटवाल, शिव दत्त पंत, हेमा हरीश भंडारी, अखिलेश भट्ट, योगाचार्य देव सिंह बिष्ट, पूर्व राज्य मंत्री धीरेंद्र प्रताप, शमशाद पिथौरागढ़ी, बीना नयाल, प्रताप थलवाल, द्वारिका चमोली, उदय ममगई राठी, शिल्पकार चेतना मंच बिटि श्री सुरेश कोहली, सुनील कुमार, खीम सिंह रावत “उतरैणी वळा” श्रीमती विमला राणा, जग मोहन सिंह जिज्ञांसु अर गढ़वाली कुमाउनी जौनसारी अकादमी तरफां बिटी रमेश तिवारी जी मौजूद छया।
ईं संगोष्ठी व कवि सम्मेलन मा उत्तराखण्ड का धरातल से जुड्यां विषयों फर विमर्श अर काव्यपाठ ह्वे। ये संगोष्ठी मा उत्तराखण्ड कु पलायन अर सरकार द्वारा उपेक्षित मुद्दों फर बी भौत भलि चर्चा ह्वे। सभागार मां बैठ्यां श्रोताओंल वार्ता अर कविताओंक खूब आनंद ले। आयोजन मा नारा छौ “काव्य में कुमाऊं, स्वर में संस्कृति” जो भौत सार्थक तरिकल आयोजन मा सिद्ध ह्वे। कार्यक्रमकि अध्यक्षता सुरेंद्र सिंह रावत जी अर मंच कु संचालन महासचिव राजू पांडे जी द्वारा करे गे। जलपान अर अन्य प्रबंधन कोषाध्यक्ष कुंदन भैसोड़ा द्वारा करे गे. अंत मा समिति का संस्थापक सदष्य अर अध्यक्ष श्री सुरेंद्र सिंह हालसी द्वारा सब्या साहित्यकार, कवि, सदष्य, सहयोगी अर आगंतुकोंक स्वागत का दगाड़ आभार करद करद बोलि कि सब्या दगड्यों कु यनि सहयोग रालु त हम अपणि भाषा और संस्कृति थें बखूबी बचै सकला।
