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छाल-छांट
वास्तव मा जिंदगि मा इतगा खैचातांणि छन कि 2020 मा प्रकाशित य किताब 2026 मा जैकि म्यारा हथ लगि । किताबि कु बिल्यु प्रिंट जै रूप मा लेख्वारै जिकुड़ि मा छौ ‘रावत डिजिटलन’ ऐनसैन उन्याउनि प्रिंट भैर निकालि दे।
किताबि कु मुख पृष्ठ बिल्यु बिल्यु चमकदार असमानी स्वांणु च। बादल पहाड़ पेड़ पोखर अर यूं हत्यांणा बान खैचातांणि करदरा हुक्मरान ई कविता पोथि का मुखपृष्ठा आकृष्ण छन।
‘कखिम कुतगलि कखिम चव्टा ‘.. किताबि मा पाठकु तैं अगनै बढणै ज्व शक्ति रस्ता बणांद वाच् किताबि की प्रभौशाली भूमिका अर यु विशारद कार्य कर्यु च् गढवलि भाषा सिद्धहस्त गजलकार पयाश पोखड़ा जी की विद्वत कलमौ।
उनत् लेख्वार ‘उपरि’ भलिकै जणदिन कि कलम फर तलवारी धार लांणि एक बड़ि भारिकि तपस्या च् अर नै लेख्वारू तैं पैलि पैलि किताब मा उत्यड्डु लगणै सौ फीसदी गारंटी रैंद। नै पुरणा विषय ह्रीं य समाजिक राजनैतिक चिंतन सब्या सबि अनुभौ की भट्टी मा तपि कै हि प्रभौ घ्छडदिन
गढवलि हिंदि अंग्रेजी सब कुछ पैड़ि ले मिक्स /युं बातौं फर ध्यान दे फ्यूचर कैरि ले फिक्स’?…. खँचातांणि भैर बटै
पकीं आमु की दांणि दिखेंद पर भितर बटि अभि हौरि पकंणै गुंजैश भि रखद। ये सामान्य तथ्य थैन लेख्वार खुद भि स्वीकार कन मा झिझक नि करदा।
से लेकिन भाषा का प्रति सुन्नपट हुयां लोखु से बेहतर योच कि ‘उपरि’ जन युवा अपंणि भितरि लेखन उर्जा बंणैकि रखीं अर ‘कुछ कुछ काचि कुछ कुछ पाकि’ रचनों हि सै पर भाषै स्यवा निरंतर करदि हैं। य पद्य पोथि खँचातांणि हत मा आंदै ठिक इनि ऐसास करांद। अचगाल रिश्ता नातों कु ऐना चड़िक गे!.. भितरा कु भेद भैर पंचैति मा
बथैकि/ च्या पींणि खिड़खिड़ि त् मत्ये मत्येकि ?…. कविताँ मा चुटगिला रस ख्वजंदरा पाठकु खुणि त्’ खैचातांणि’ एक सर्वोतम विकल्प च् भै।
1-डैकणा कि चटणि बंणाद क्वि नि द्याखु/खिरबोजौ भींड उज्यांद क्वि नि द्याखु 12-धुरपलि कि चिंणै मा धर्यु गंगल्वड डूंडा मनिखि खुटा फरै लसम्वड्डु ! ?
वीरेंद्र जुयाल की लेखनी ठेठ गाँ खाल/ख्वाल बजार की लोकभाषा च्। उंका गंभीर विषयों फर गंवईपन मा लिख्यां संवाद हास्य पैदा करदन।
– चटपुटु खैकि पंचदु नी/अलुंणु मीथै खपदु नी! 2-अपंणा पुरखाँ की समलौंण थै/आग जन पिलचांण चंद ! अपड़ि पछ्यांण की कूल थै सिन नि बिसगांण चंद !?…. यदि वीरेंद्र जुयाला लेखन थै स्तरीयता / स्तरहीनता भाषाई सजगता /चिंतन गुणवता / काव्य सौंदर्य अगैरा बगैरा कसौटी से फुनै कैरिक पढे जाउ त् इन मैसूस होंद जनबोलिक गौंका बाटौं मा /
‘ पंचैत भौन की दिवाल मा/ ख्वाल का खल्यांणौँ मा/चारागाह भ्यालौँ मा छोरी छारौं की कछड़ि जमी ह्वा जु मस्त मलंग बेपरवाह ह्वेकी आपस मा संवाद कना ह्रीं माटि की भाषा मा।
ई पोथि मा लेखकै यई विशेषता उभरि कै सबसे जादा उठि कै आंद ।
‘चल तुमड़ि बट्या बाट ‘ —
वीरेंद्र जुयाल की लेखनी किताबि की
शुरात से आखिर तलक अक्षरक्षः चल तुमड़ि बट्या बटि मंत्र थै पखड़ि हिटद। उंकी निर्भीक कलम न दें होंदि न बैं।
सीकासैर/लंपसार/कंडलि झपाग/मुछ्यलु/चलक्वार/हमरा गैराल/चर्रचर्र/खैचातांणि/खतपत/कचाग/झस्स झस्स/छस्स छस्स/घबलाट/चुंगिनी अर भारै कवितों का शीर्षक हि संकेत दे दिंदन कि लेख्वार पाठकु जिकुड़ि अर ख्वपड़ि की मगजि भारि नि होंण दींण चांदा।
ड्वारा सुप्पु डाळु कंघुलु/रौड़ि ठेकी मटेलु डलुंणु / गंजेली उरख्यलि पाथु जंदरू/तमोलि कमोलि दैपुर मंदुरु / अब कतगै धांणि बिसरि ग्यों/ भंडि बरसु बटि गौं नि ग्यों !!?
अगर भंडि दिनु बटिन आप भि गौं जांणौ सौभाग्य नि पै साका त् हालफिलाल अपंण डबल ब्यड मा लमडिशांणि मुद्रा से हि ‘खैचातांणि’ पढद पढद अपंण गौं कूड़ि धुरपलि व समाज की गति कुगति की खैर खबर हालचाल ले सकदवा ।
जौंल गौं गल्या धार खाल उकाल नि नापि/उंकु पित्रकूड़ि मा मुंड टिकांणु सुद्दि नि हूंदु ? उपमा अनुप्रास अलंकार शाब्दिक सौंदर्य मात्रा छंद बंध का बनौटीपन का लालच मा अयां बगैर धड़म से अपंणि बात धनौ नाम हि ‘खैचातांणि’ च् ! कैभि लेख्वार की सबसे पैलि खैचातांणि अपंणा आप से अपंणा मन से हि शुरू होंद कि वेकी ब्वलीं य लगई बात जमलि कि ना ।
मित जु उंघणां छन उंथै कलम से घुच्यांणु छौं / माटा कु आदिम छौं गढवलिम बच्यांणु छौं ? सबसे बड़ी बात य कि भाषा की स्यवा मा य पोथि अपंणु योगदान दींणा मा पिछनै नि राई। अनेकानेक शब्द जु मेरी स्वयं की स्मृति से विलुप्त ह्वेगे छा वु मीथै वापिस मीलि गीं। लेख्वार वीरेंद्र जुयाल उपरि कु यो भाषा उल्लास एक ढाढस भि बंधांद कि लोकभाषै स्थिति उतगा
भि दयनीय नीछ जतगा प्रचारित हुई च् । इलै निश्चित रूप से वीरेंद्र जुयाल उपरि
साधुवाद का हकदार छन ।
