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रंत रैबार ब्यूरो
देहरादून। भौतिक संसाधन जुटौणै होड़ मा अगनै रैणै कोशिश का चल्द आज जीवन भौत गतिशील हवेग्ये। हर आदिम अगनै रैणी उतौलु होंयू छ। एक विज्ञापन औद टीवी मा कि भला वीकि साड़ी मेरि से जादा सफेद किलै छ। यीं झकास सफेदी कि होड़ मा सबि अपणि पूरी तागत खर्च कर देणा छन। पर जु लोग समणि वळा कि बरोबरी पर नि ऐ सकणा छन यूं खुण एक अलग हि उठापोड़ मचीं छ। यिनी स्थिति मा क्वी आखिर क्या करो। यी कारण छन कि मनखि हर टैम तनाव मा छ। बोदन बल कि आजौ मनखि अपण दुख से बुथगा दुखी नी छ जथगा हँका सुख से दुखी रैंद।
अजक्याल आत्महत्या का मामला जगा-जगा सुण्न-पढ़नौ मिल्ना छन। यिना कथगै मामला छन जाँमा कारण यिथगा संगीन नि होंदा कि आत्महत्या जनु फैसला ल्हेणौ नौबत ऐ जाव। फिर ज्यान देणै य आपाधापी किलै होयीं छ। यिनी क्य मजबूरी अर उन्माद छ कि क्वी अपणि जिंदगी कि दांव पर लगै दूयाव। यीं स्थिति तै सोच बिचारी हमर बुद्धिजीवी अर मनोवैज्ञानिक काफी परेशानी मा छन। वृंको बोनु छ कि अति तनाव कि स्थिति औण से हि क्वी आत्मघात जनु फैसला ल्हेंद। अब सवाल यो छ कि एक टीन एजर खुणै अति तनाव कि स्थिति किलै औणी छ। कथगै बच्चा त ये तनाव मा ज्यान दे दिंदन कि चूंका नम्बर बुथगा नि आया जथगा वृंका घरवळों कि अपेक्षा है। कथगै यो लेखी फांसी खै लिंदन कि चूंकि वो मां बाप कि अपेक्षा पर खरा नि उतरा ये वास्ता ज्यान देणा छां। य क्या बात छ भै।
आखिर जिंदगी कि जंग त ज्यूंदा रैण पर हि जिते सकद। जब मर हि जाण त फिर मेरिट कैकि औण। बस यी कुछ कारण छन नौन्याव्ठ्वी अपघात कनै मानसिकता का पिछनै। घर वळा अपण बच्चा तै शीर्ष मेरिट मा रखणो-मुंड-कपाळ कन पर लंग्या छन। बूंतें सैन न्ही कि वृंको नौन्याळ पड़ोसी का बचा से कम नम्बर ल्यावा।
बच्चों का मन मा तनाव रैंद कि वो कनक्वे अव्वल आलो बस यी दौड़ मा पिछनै रैकि वो अवसाद कि स्थिति मा ऐ जांद अर नतीजा अपघात। बात सिर्फ पर्दै कि नी छ सूचना प्रौद्योगिकी यिथगा तेज, प्रतियोगी अर भूलभुलैया वळि हवेग्ये नी छ। आजौ बच्चा घर मा कंप्यूटर त मंगदो कि छ दगड़ा-दगड़ि वो इंटरनेट कनेक्शन वि मंगद। अब इंटरनेट कथगा बच्चों हैं उपलब्ध छ। यि त अंगुळ्यूं मा गिणै जै सकदन पर बूंका कंप्यूटर देखी बाकी बच्चों का भितरै हीन मानसिकता को मापन क्या छ जौंका ब्वे बाब य सुविधा वृतै नि ये सकदा, गौर कन वळि बात या छ। वो नौनी ये वास्ता मैगु मोबाइल फोन मंगणी छै किलैकि वीकि दगड्यों मा मैंगा फोन छा। अब इस्कुल्योन फोन रखी क्या कन यु त वी जाणन पर यु सच छ कि वु चै ध्याड़ी मजूर हो चै क्वी बड़ो अधिकारी, सच्या सबि सबसे मैंगु फोन रखणै होड़ मा मिस्यां छन। श्याम बरतो भले ही खाणु नि जुड्दो हो पर मोबाइल रीचार्ज जरूर होण चैणू छ। यानि मोबाइल फोन आज का मनखी पैलि जर्वत बण ग्ये। अब चै भला कपड़ों कि बात हो चै मैंगा से मैंगा मोबाइल फोन कि, मेरिट मा सवसे पैला नम्बर पर औणै दौड़ हो चै सबसे मैगा इस्कूल मा बच्चों हैं पढ़ौणै जुनून यि सब कारण आज हमतें हीन अर श्रेष्ठतम मानसिकता का बीच पीसी चटणी बणौणा छन। नौन्याळ इस्कूल बटी क्य पैड़ी आये यां पर कैको ध्यान नही। वो तमाम बच्चों का बीच सबसे चमकदार लगणू छ कि न, यां पर जादा जोर छ घर वळों को। वेकि पर्दै सिर्फ ट्यूशन कि बैसाखी पर टिकीं छ। इस्कूलमा क्य और कथगा पड़ै ग्ये यांखुण स्वचणो ट्यूटर रख्यूं रैंद अर वी वे बच्चा कि जिंदगी को फैसला कन वळों होंद।
बात अगर ट्यूटर कि कर्य जाव त मां-बाप खुण गर्व कि बात य होंद कि वृंका छोरा को ट्यूटर कथगा फीस ल्हेंद। यानि ट्यूटर जथगा मैंगु होलो बच्चा कि मेरिट बुधगै गारंटेड। कुनै ट्यूटर वि भौत समझदार हवे ग्येनि वो बि बच्चै स्कूल पूछी अपणि फीस बतौंदन। जथगा मैंगी इस्कूल बुथगै मैंगो ट्यूटर। ट्यूटर बि बस बच्चा तैं बुधगै पढ़ींद जांसे कि छोरा अच्छा नम्बरूमा पास हवे जाव। अब परेशानी बूं लोग्वी छ कि जु अपण छोरों तैं मैंगा ट्यूटर नि लगै सकदन एक हि इस्कूल का द्वी बच्चों का बीच ट्यूशन अर ट्यूटर हैं ल्हेकि हि भारी तनाव रैंद। बच्चा भले ही प्रगट नि करो पर वेका अंतर्मन मा कखि हीनता को भाव जगा बणै देद। बस यी हीनभाव वेखुण अवसाद कि स्थिति का कारण बणद। यिनि हालत जाणी छ मा मेरिट पिछड़ जाण से वेकि य त पर्दै से मन हट जांद अगर कोशिश कन वळों बच्चा हो त वो प्रयास का बावजूद पिछड़न से अवसाद कि स्थिति से ग्रसित हवे जांद।
बात सिर्फ बड़ा परिवारू से जुड्यां बच्चों कि हि नी छ य स्थिति गरीव परिवारू का बच्चा मा वि आम छ कि वृंको बच्चा सबसे जादा अंक अर्जित करो। बोनो मतलब यो छ कि समणि बळा से अगनै निकळनै होड़ आखिर समाज हैं कै दिशा मा ल्हेकि जाणी छ। ये बिंदु पर गंभीर मंथन कनै जर्वत छ। आज जबकि नैतिकता, विवेक, शैक्षिक योग्यता अर सामान्य ज्ञान को कखि नौ नहीं। बच्चा जनि सयाणा होणा छन तनि बड़ों तैं सम्मान देणू छोड़ देणा छन। ब्वे-बाबु खुण मुंडरू बणी वे वृर्त वृकि करनी को सवाद चखौण छन। वो अहसास करौणा छन कि जनु बुतल्य वुनि कटल्य बि। अगर बचपन बटी हि अच्छा संस्कार डळ्यां होंदा त आज कन नि कर्दा हम तुमरि इज्जत। अब चूंकि मैरिट मा त ऐ नि सक्य से वास्ता नौकरी मिल्ने सम्भावना कम हि छ। यिनि हालत का चल्द आखिर आजै ज्वान पीढ़ी हीन सोच कि शिकार होणी छ। यीं हालत से भैर निकळनो वो अब नशा कि तर्फ जाणू छ अर नशा कि पूर्ति कनौ वो अपराध का तर्फ उन्मुख होणू छ। राजधानी की शैक्षणिक संस्थों मा पढ्न वळा बच्चा दिशाहीन हाँद जाणा छन।
