सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी
‘देवभूमि गढ़वाल मां प्राचीनकाल से ही मैं बोली कु उपयोग यख का जनमानस द्वारा हांड है, पांचवां कू नौ छ होन गढ़वाली, भले ही स्थान भेद सिया नै अनेक उप बोलियां मा बेटी छ। यख का इतिहास सी या बाम मालुम होदी की कबी कोल, किरात, खश, यक्ष, नाग, किन्नर, गुर्जर, हुण जनी कै जाति का लोग रदा छा, युं कु प्रभावशाली गढ़वाली बोली पर भी देखे।
डॉ. सुनीति कुमार चतुर्वेदी न ‘भारतीय आर्यभाषा और हिन्दी’ पुस्तक मा भारतीय संस्कृति का मूल मां निषाद, आर्य, द्राविड़ अर किरात जात्यौं कू विशेष महत्व समझी, यूं सक्यौं कु प्रभाव गढ़वाली बोली पर भी दिखेंदु। यख का लोक साहित्य पर नागों कु बि-बहुत जादा प्रभाव दृष्ट्याण मा औंदु। मात्र साहित्य पर ही नहीं बल्कि यख का अनेक स्थानु कु नामकरण मी ई जाति
का आधार कर करेगी।
डॉ. राधा कुमुद मुकर्जी न अपणी पुस्तक ‘हिन्दू-सभ्यता’ का पृ. 71 लिखी कि कत्यूरी हिमालय क्षेत्र कू ऐतिहासिक राजवंश छ, जौन कि 850 आसपास गढ़वाल मां अपणु राज्य यूं का कै ताम्रपत्र अर अभिलेख का सी मा पैलु का बसाई। प्रभाव गढ़वाली बोली अछूती नि है. सकदी। वंश सन् 1400 का बाद गढ़वाल मां पंवार की स्थापना अर वांका बाद 1803 मां राजा प्रद्युम्न शाह की युद्ध मां मृत्यु होण सी यख की सत्ता गोरखों हाथ मा गै अरे 1815 मां अंग्रेजों की मदद सि गढ़वाल गोरखों का शासन सी मुक्त त हह्वया पर पौड़ी गढ़वाल अंग्रेजों का अर टिहरी पंवार वंशीय राजा का अधीन मां बंट्यना। ई ऐतिहासिक उठा-पटक कू प्रत्यक्ष प्रभाव, रहन-सहन, खान-पान का दगड़ा-दगड़ी गढ़वाली बोली पर भी पड़ी।
‘कत्यूरियों को शासन काल सी पैली अर्थात् नौवीं शताब्दी सी पूर्व गढ़वाली मां क्वी क्रमबद्ध लिखित साहित्य नि मिल्यूँ, खाली मौखिक रूप मां ही उ रच्यूँ-बस्यूँ थी। यख का लोकगीत, पवाड़ा, लोकगाथा, लोककथा, अखाणा-पखाणा पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक ही ऐथर-ऐथर बढ़दी गैन, यूं समाज तें एक दशा भी मिल्दी रै, अर का प्रभाव सी जन सामान्य की दशा सि वां मां भी सुधार आई। ग्रियर्सन न गढ़वाली बोली आर्य भाषाओं की भीतरी उपशाखा का अंतर्गत निर्धारित करि अर यांकि उत्पत्ति “अवन्न्य अपभ्रंश” सी मांणी। अवन्न्य अपभ्रंश शौरसेनी (नागर) कू ही एक रूप छ, गढ़वाली बोली पर कुमाऊँनी नेपाली का समान मागधी कू भी प्रभाव दिखेंदू। डॉ. धीरेन्द्र वर्मा न ‘हिन्दी भाषा का इतिहास’ पुस्तक का पृ. 48-49 मां पहाड़ी भाषाओं के सम्बन्ध शौरसेनी अर
अपभ्रंश सी ही माणौ, यूं कि ही तरौं डॉ. उदय नारायण तिवारी न भी अपणु मत व्यक्त करी। दूसरी तरफ डॉ. सुनीति कुमार चतुर्वेदी ये सम्बन्ध मां अपणु भिन्न मत देदन अर ब्वल्दन कि पहाड़ी भाषाओं की उत्पत्ति अर सम्बन्ध ‘दशद’ या ‘खश’ सी प्राकृत भी छ। हक्कि तिर्थ मैक्समूलर न गढ़वाली भाषा कू एक रूप माणी। इन्नि और कै विद्वान ए सम्बन्ध मां अपणु-अपणु और भी मत देंदन।,
यदि हम लिखित आधार पर गढ़वाली बोली का प्रारम्भिक रूप पर नजर डालौ त प्रतीत होंदु कि यख समय पर सभी लेखु कु आरम्भ संस्कृत मां हवै, संभवतः तबारी गढ़वाल मां संस्कृत कु प्रचार-प्रसार बहुत रै हो। देवलगढ़, बद्रीनाथ, मालधूल, देवप्रयाग जना कै स्थानु पर जु शिलालेख, दानपत्र आदि छन। उ संस्कृत मिश्रित गढ़वाली मां लिखिवद्व छन। इन्नी और भी
कै दस्तावेज़ छन जु संस्कृत शब्दु सी युक्त छन।,
- मा समय का अनुसार जनु-जनु समाज बदलाव आई बेक्का आधार पर गढ़वाली बोली का उच्चारण, लिखण-…. पण्पण अर लिखित-अलिखित साहित्य मां के प्रकार की विद्याओं कू भी उदय होंण लगी। ई परम्परा मां जख एक तिर्य पारम्परिक पवाड़ा, जागर, मांगल गीत, पेशावर गीत, कुलाचार गीत, अखाणा-पखाणा, कथा-वार्ता की खूब भरमार थे।
