ब्यौरो रंत रैबार….
गैरसैण तैं उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी बणण की मांग हैं लेकि फिर उग्र आंदोलन होणु छ। स्थायी राजधानी गैरसैंण समिति न सरकार के खिलाफ आर-पार की लडै कु ऐलान करि यालि। आंदोलनकारियों कु आरोप छ कि सरकार गैरसैंण कु मुद्दा पर जनता तैं आश्वासन देंद रैंद पर अबि तक निर्णायक कदम नि उठै।
स्थाई राजधानी का मामला मा अंतरिम सरकार का मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से ल्हेंकि मौजूदा सीएम पुष्कर सिंह धामी तक सब्यन गैरसैण मा राजधानी कि तर्ज पर काम करिन। पैलि वादा करिन अर बाक्युन थोड़ा थोड़ा काम करैकि लोग्वी उम्मीद कायम रखणै कोशिश करि। त्रिवेन्द्र सरकारन एक कदम अगनै चली गैरसैंण तैं रूड्यां राजधानी बणौणै घोषणा कर द्ये पर एक सवाल फिर बि बाकी रैग्ये कि अगर गैरसैंण रूड्या राजधानी छ त हयूंद्या को। साफ छ कि देहरादून फिर स्थाई राजधानी को हे सकद यो सवाल अबि बि प्रदेश कि जनता का दिमाग मा ज्यूदो छ।
झारखण्ड अर छत्तीसगढ़ का दगड़ि 27 वे राज्य का रूप मा नो नवम्बर 2000 खुण उत्तराखण्ड को उदय ह्वे। द्विय राज्यों कि राजधानी त तत्काल घोषित हे ग्येनि पर उत्तराखण्ड का राजनीतिज्ञ आज तक फैसला नि कर सक्य कि स्थाई राजधानी को होलि। उत्तराखण्ड हि यिनु राज्य छ जेकि द्वी विधानसभा कि आवधारणा चल्नी, छ। यानि एक गैरसैंण अर दूसरी देहरादून। आखिर हमरा सियासतदानों कि क्य मजबूरी छ कि वो स्थाई राजधानी को नौ ल्हेण मा यिथगा डर्या छन। अब कांग्रेस घोषणा कनी छ कि अगर वो सत्ता मा. ऐयि त वो गैरसैंण (भरारीसैंण) तैं स्थाई राजधानी बगैलि।
साफ सि बात छ कि कोंग्रेस, यी बात हैं तब बोनी छ जब वो विपक्ष मा बैठी छ। पर अगर पार्टी का नेतों से पुछे जाव कि वींन 10 साल राज्य कि बागडोर समाळी रखि। पर तब वून यीं बातौ जिक्र बि कि करि। यिनु किलै। वुनै कांग्रेस अर बाकी दल भाजपा तैं हि यें मामला मा असल दोषी बतौणा छन। वृंको तर्क छ कि चूकि झारखण्ड अर छत्तीसगढ़ कि राजधानी तत्कालीन केन्द्रीय भाजपा सरकारन तै कर द्ये छै त उत्तराखण्ड का मामला मा वींन क्की फैसला किलै नि ल्हे। कुछ हद तक यों आरोप सै बि लगणू छ। किलैकि अंतरिम सरकार का टैम पर केन्द्र अर उत्तराखण्ड मा भाजपा शासन कनी है। फिर यिनि क्य मजबूरी है कि स्थाई राजधानी को मुद्दा अधर मा लटकैकि रख्यूं रैग्ये।
पैलि चयनित सरकार का मुखिया वयोवृद्ध अर अनुभवी राजनेता पं० नारैण दत्त तिवारी रैनि। फिर चूंकि क्य मंशा है कि वून बि स्थाई राजधानी का मामला मा चुप्पी साधी रखि। अगर तिवारी जी ठाण लेंदा त स्थाई राजधानी का मुद्दा तैं चुटकी मा हल देंदा पर बूंन यिनु नि करि आखिर किलै? ये बीच राज्य आंदोलनकारी स्थाई राजधानी कु मुद्दा उठाँदा रैनि अर दुसरि तर्फ देहरादून तैं स्थाई राजधानी की तर्ज पर विकसित कनौ पाणि कि तरां रूप्य बौगै जाणा रैनि। पर तिंवारी बि अनुभवी राजनेता रैनि बूंन बूं तमाम मुखर आंदोलनकार्यों तैं राज्य क़ि तर्फ बटी उपकृत कनु शुरू कर द्ये। कै तैं राजकीय नौकरी दिये ग्ये त कुछ तै पेंशन देकि वृंका गिच्चा बंद कर दिये ग्ये। वो जणदा छा कि अगर यि लोग मुखर रया त क्की न क्की फैसला ल्हेणा हि पड़लो। यांक बाद स्थाई राजधानी को मुद्दा कुछ चुनींदा मौकों पर उठये जांद रै पर यांखुण सक्रिय प्रक्रिया नि चलि। बस फिर क्य छौ। चूंकि क्वी सवाल उठौण वळो रै नी छ जो छा वो अब तलक कबि-कबि ये मुदुदा पर जननेतों कि नीयत पर सवाल उठौणा रैंदन। वो वि दीं आवाज मा।
ये मामला मा राज्य आंदोलनकारी शक्ति आंदोलन का दौरान खूब मुंड-कपाळ कना रैनि। आज बि यो गैरसैंण तैं स्थाई राजधानी को सुपन्य सज्येकि बैठ्यां छन। आंदोलनकारी होणां नाता वो जरूर फ-फा कैरी अपण होणो अहसास जरूर क्देन पर असल मामलु कुछ हौर हि छ। दरअसल देहरादून (मैदान) का ग्लैमर से कबि मुक्त नि होंया। आज 26 साल बाद बि वो राज्य कि च्यनित सरकारों कि नीयत पर अंगुळी उठौणा छन पर यी वी नेता छन जाँ तँ राजभोग को मौका नि मिलि। चूंकि वो सत्ता सुख को तजुब्बा नि ल्हे सक्य ये वास्ता वो ये मामला तै ल्हेकि अपणा हि दल तै कटघरा मा खडो किनौ कसर नि छूवड्दा। यीं बातौ उदाहरण छ उत्तराखण्ड क्रांतिदल । जैन राज्य आंदोलन मा तमाम संघर्षों कि अगुवाई करि। क्षेत्रीय दल होणा कारण प्रदेश कि जनता बि ये दल पर भरोस् कदो छा पर येका नेता बि राजभोग कि नौण को सवाद ल्हेकि चुप ह्वे ग्येनि। सत्ताधारी सरकार दंगड़ि मिलजुली माल बटोळना मा वृंको ध्यान रये पर दल का सिद्धांतं अर चुनौ घोषणा पत्र मा उल्लिखित मुद्दों पर वून आंखा बूजी रख देनि। सरकार मा साझीदारे बणन से पैलि बडा दल से अपणि शर्त रखिन पर सत्ता मिल्दै वो चुप ह्वे ग्येनि। आज बि कांग्रेस हो य भाजपा य फिर उक्रांद यूं सबि दलों मा वो कुछ यिना नेता मौजूद छन जॉन आंदोलन का दौरान छक्के पुलिस कि मार खै पर जनि वृतैं सत्ता मिलि वो कम से कम गैरसैंण तैं स्थाई राजधानी बणौणा मामला तैं बिसरि रयेनि। आखिर यिनु किल ?
