(दिनेश जोशी’ अज्ञात दिदा)
जय पर्वत अर जय पर्वत, आज मन दुख बिचारी, गंगा-ज्यूं निर्मल यो धरती, कं बनि गाय दुख की क्यारी॥
जय धरती बद्री-केरोन की, जय नंदा राजराजेश्वरी की, जय तूं जागर गूंजदा रैंडा, जय तूं बसदी लोकसंस्कृति॥
चौखंबा का हिम मुकुट चमकदा, नीलकंठ अर त्रिशूल खड़ा, पंचाचूली का धवल अंचल, देखी सूरज भी झुकदा बड़ा ॥
भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, सरयू धार, कण-कण में देवत्व बसदा, जग में ऊँचो यख को सार ॥
यख का खेतों में मेहनत फुलदी, यख की गौशाला धनवान, यख की मातौं पीठ मं दुनिया, हाथों में श्रम कु वरदान ॥
घास-काठ अर पानी ल्यांदी, सुपरमार्केट डांडौं चढ़दी रै, अपने सुख दुख भूली-जांदी, घर-गृहस्थी गढ़दी रै ॥
यख की बेटी नंदा-ज्यूँ छ, यख की ब्वारी लक्ष्मी रूप, यख की नारी उत्तराखंड की, अटल शक्ति अर जीवन धूप ॥
हम कन-कन मं शंकर देखां, हर शिखर में केदार बसां, हर नदी में माता देखां, हर अतिथि में नारायण जाणां ॥
यखी संस्कारों की धरती, यखी सरल मनौं की जात, ईमानदारी यख की पूँजी, सच्चाई यख की औकात ॥ पर आज कसि बेरा आई, मन भीतर तुफान उठ्यो,
न्याय व्यवस्था कु दीपक जैसे, तेज बिना अंधियार में बुठ्यो । धज्जी उड़गी नियम-कानून की, जनता मौन खड़ी देखदी,
संविधान का पन्ना-पन्ना, अपने भाग कु लेख पढ़दी ॥ जौं साधारण जन भूल करदा, दण्ड कठोर तुरन्त मिलदा, पर उपद्रव अर हुड़दंग आगै, कां कानून मौन रहंदा ? यि प्रश्न सिर्फ इक घटना को नि, यि जनता का मन की चोट, यि स्वाभिमान कु घाव गहिरो, यि विश्वासौं की टूटती जोत ॥
गैरसैंण का डांडा पूछदा, कां चुप छन सत्ता के द्वार, टिहरी का जल आज पुकारदा, कां खो ग्यौ न्याय कु सार ?
पिंडर घाटी रोष मं बैठी, कफारा, दिदा, कर्णप्रयाग, जोशीमठ का पीड़ित पत्थर, करदा शासन से सवाल ॥
यमुनोत्री की धार पुकारे, गंगोत्री का हिमनद रोय, रुद्रप्रयाग का हर पत्थर, न्याय बिना व्यथित होय ॥
चंपावत से धारचूला तक, मुनस्यारी का हिम आकाश,
हरिद्वार का गंगाघाट भी, पूछण लागा यख को इंतिहास ॥
देहरादून की चौड़ी सड़कौं, अर पहाड़ का टूटा मान,
दू-दू तस्वीरों का उत्तराखंड, कैसे सहला अपमान ? हम ना हिंसा चाहण वालां, ना वैर-भाव की बात करां,
पर न्याय समान सबकै मिलो, बस यै लोकतंत्र से कहां ॥ शासन यदि निष्पक्ष रहलो, जनता साथ खड़ी होली,
पर अन्याय का बोझ बढ़लो, त व्यवस्था कमजोर होली ॥ आज भी चौखंबा अडिग खड़ो छ, आज भी हिमालय महान,
पर जनमन का टूटदु विश्वास, सबसे भारी छ नुकसान ॥ उठो देवभूमि का नौजवानौँ, अपण संस्कृति याद करौ,
सत्य, न्याय अर स्वाभिमान की,
फिर से ज्योति प्रज्वलित करौ ॥
जै बद्रीविशाल का आशीष, जै बाबा केदारनाथ,
जै नंदा, सुरकंडा माता, राखण यख की सच्ची लाज ॥ जै पहाड़ अर जै पहाड़ी, यख पहचान अमर रैणी, सत्य, न्याय अर स्वाभिमान की, गाथा युग-युग भर गैणी।
