(भगवती जुयाल गढदेशी लोककवि)
अनमती भान्ती की हुंदन मनै दंदोल्या गाणी सडैम कख्यो कखी ली जांदन मनख्या प्राणी
सेयूं मनखी विसुद ह्वे जै होस हवास नि रेंद जणि कुजणी कन गाणी च स्वीणौं मा रमे देंद
काम धाणीम थकरच सुनिंद ह्वयूं खटुला मा हंसणु कभी रोणू कभी डरण लग्यूं स्वीणौं मा
हरकि फरकी बबलाणू बड़बड़ाण डिसणा मा बथौं बणी उड़ै ली जांदू उलखणी स्वीणौं मा
कभी कै भेल कभी कै ढंडी नचरांद रात्यूं मा बनि बन्या स्वीणा लिगल्यांदा रैंदा रात्यूं मा
पतनी क्या बात च पतनी कन क्यो इनू होंद ताणी कि सेयूं मनखी स्वीणौं मा ख्वे सी जांद
तन का आँखौं कु क्या पट चेप बूझी बंद रेंदा विधातै अजीब रचना मन का आँखा भरमौंदा
बिनसरी मा छिबड़ाट कंदुडू चट खुलदी आँखी राती हिंडोला सी छौ खेनू पोड़ी तणेणीन सांखी ।।
