रंत रैबार ब्यौरो…..
पर्यटन का लिहाज से उत्तराखण्ड अपणि आर्थिकी सुधरणों गंभीर प्रयास करो त यखा नागरिकों कि आमदानी मा वृद्धि हवे सकद। पर यिनु हवे नि सकणू छ। प्रदेश गठित होयां 26 साल वे ग्येनि पर आज बि पर्यटन विभाग का जिम्मेदार तीर्थाटन अर पर्यटन का लिहाज से महत्वपूर्ण स्थलों को चिन्हीकरण नि कर सक्य। शैद यांक पिछनै विभागीय अधिकार्यों, जन प्रतिनिध्यिों अर स्थानीय जनता मा क्षेत्र तें पर्यटन का नक्शा मा ल्हाणक प्रति जागरूकता को अभाव छ। हां सरकारी दस्तावेजों अर सभा मीटिंग्स मा हमरा नेता लोग जरूर दावा कर्दन कि प्रदेश पर्यटन कि दिशा मा तेजी से विकास कनू छ पर हकीकत ठीक यांक उलट छ।
विकासखण्ड भिलंगना अंतर्गत एक दर्जन से बि जादा स्थल पर्यटन अर तीर्थाटन का दृष्टिकोण से आज बि उपेक्षा का शिकार छन। यूं तक पौंछणो चूंकि सड़क य रोपे वे नि छन ये कारण पर्यटकों तैं यूंको लाभ नि मिल्दो। यूं मद्दे कथगै त सरकारी उपेक्षा का चल्द बंजर होणौ स्थिति तक पौंछ्यां छन। अगर यूंकों विकास अर सौंदर्याकरण करे जांदो त न सिर्फ प्रदेश मा पर्यटन का वास्ता नया द्वार खुल्दा बल्कि स्थानीय लोगु तैं रोजगार बि मिल्दो।
विकासखण्ड का अंतर्गत पंवाली, कांठा, जराल ताल, विश्वनाथ, मेंडू पर्वत, भांसर ताल, लिंगराज, द्रोपदी ताल, हटकुणी अर गंगी का बुग्याळ आदि कथगै उमैलो स्थलों को अबि तक चिन्हीकरण नि वे सकि। हटकुणी अपण आप मा कुदरत कि एक बेजोड़ मिसाल छ पर वख तक पौंछणा साधन नि होण से उपेक्षित पड्यूँ छ। यख सुविधों भारी अभाव छ। ये वास्ता वुनै जाणो क्वी तयार नि होंदो।
हटकुणी प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर होण दगड़ा दगड़ि ठण्डों हिंवाळ जनि जलवायु वर्षों पर्यटन स्थल छ। यख पौंछणो बिनकखाळ आखिरी स्टेशन छ। यख बटी-पांच किमी का पैदल ट्रैक से यख पौंछे जै सकेंद। बीज-बुरांश का घणा जंगळों का बीच स्थित यो स्थल खास तौर पर सैलान्यू तें अपण तर्फ आकर्षित कर्द। हटकुणी मा भैरवनाथ को प्राचीन मंदिर छ जो कि स्थानीय नागरिकों कि आस्था को केंद्र मन्ये जांद। मंदिर परिसर मा एक धर्मशाला बि छ पर वो ठीक रखरखाव का अभाव मा उपेक्षित स्थति होण से सैलान्यों का कामै नि रैग्ये। कबि क्वी ट्रैकर य टूरिस्ट होण कारण मासरताल, सहस्त्रताल अर केदारनाथ जाण वळा सैलान्यों का वास्ता थौ बिसौण लिहाज से प्रयुक्त होंद। यख रात रूकी सुबेर वो लोग अगनै यात्रा पर निकळ्दन।
वुनै अल्मोड़ा जनपद मा बि कथगै जगा यानि छन जख अबि तक पर्यटन विभाग कि नजर नि पौंछि य फिर यां खुण प्रयास हि नि करे ग्येनि। प्रसिद्ध जागेश्वर धाम का नजीक झांकर सैम अर वृद्ध जागेश्वर मंदिर छन। यि द्विय प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण छन।
व्द्ध जागेश्वर बटी हिमालै कि पर्वत श्रृंखला यिनि दिखे जनकि हाथ बढ़ौंद हि पौंछे जाव पर यूं द्विय मंदिरों मा सुविधों को भारी अभाव छ। अल्मोड़ा शहर का पूर्वी छोर पर 12वीं सदी का कत्यूरी राजवंश निर्मित खमगराकोट किला छ जख तमाम देवी-दूद्यबतों का मंदिर बण्यां छन। यीं जगा को विकास पिकनिक स्पॉट का रूप मा ह्वे सकद पर यख तक पौछणों सम्पर्क मार्ग खस्ता हालत मा होण से यिनै औण नि चाहंदो।
यिथगै न लमगड का नजिक दंड मा वानरी देवी को प्राचीन मंदिर छ। हवलबाग विकासखंड अंतर्गत साये देवी को मंदिर स्थिति छ पर जानकारी का अभाव मा सब उपेक्षितं पड़या छन। यांक आलावा एडाघो, पहाड़ पर ऐड़ा देवी को मंदिर, ताकुला का नजदीक गणनाथ मंदिर अर प्राचीन गुफा बि छ पर यूंको अबि तक न सैलानियों सि परिचै हुवे अर न स्थानीय नेतों, संस्थो अर नागरिकों यूँका विकास अर सौन्दर्य करा कि दिशा मा क्वि प्रयास करिन।
जरूरत छ यु पर्यटन स्थलों तै विकसित कर यख हर तरा की सुविधा उपलब्ध कराणे को ताकि यख आण वला पर्यटको तै क्वि असुविधा नि हो तबि जैकि सही मायनों मा पर्यटन विकास हवे सकद।
