व्यंग्य
घुगती को रैबार
‘घुघूती… घुघूती… घुघूती…! काका! कख बिटि आणू है तु फजलेको ?’
घुगतिन नंदू काका तै गाँ का बादु से अपड़ो घौर जनै आँदा देखिक पूछ।
‘अरे घुगती। आज फजलेकी मिन एक भारि खतरनाक बात धाख। ‘काकान ढुंगा मा बैठिक ब्वाल।
‘कन खतरनाक काका ?’
‘मि व्यालि अपड़ा मोमाँ का गौं जयूं रौं अर वोखी बास रुक ग्यों। फजलेकी औंदा हुआ मेरी नजर नदी का पल छाल पोड़ ग्ये त वोख मिन द्याख कि इस्कुल्या नौन्याल नदी का ऐंच बिछ्यां ड्रम मा फाल मार मारिक जाणा छया।’
‘द काका…! सिना काम त मि रोज देखदु।’
‘ऊंकी इन हरकत देखिक त्वेतै डैर नि लगदी ? ऊं नटखट नौन्यालों पर गुस्सा नि औंद ?’
‘न’ घुगतिन जवाब द्ये।
‘ मीतै त भारि सिरड़ उठ। वो त दूर आवाज नि जांदी, निथर मिन अंतै इनी शरारत का वास्ता गालि दीण छै।’
‘शरारत न काका, मजबूरी बोल।’
‘ कनि मजबूरी ?’ काकान गुस्सा से ब्याल।
‘इस्कूल जाण की मजबूरी, हौरि क्या ? जब ऊं खुणि अक्वेक रस्ता नि बणया छन त ऊंन कन कैरिक बि इस्कूल त जाणी चना !’
‘ अरे…, पर इन जैकी क्या फैदा ? कैकु खुटु अलझे जालो अर वो पाणि मा गीर जौ, तब ? तब हेग्ये इस्कूल…।’
‘ काका! ऊंका ब्वे बाबा बि त अंतै लखा दिंदी। तब वो क्या कैर सकदन ? पढ़े त करणी च ना! तबि त बणला मनखि…!’
घुगतिन मूण करोलि कैरिक ब्वाल।
‘ मनखि जब बणला, तब बणला, परंतु अबि त ऊंका ब्वे बाबा तैं सोचण चयंद कि कुछ इन करे जाव कि नौन्यालों की ज्यान खतरा मा नि प्वाड़।’
‘काका ! तु ठिक बोनूं है। पर इन बथा ब्दी कि यो कैको काम च ?’
‘ काम त सरकार को च घुगती! पर वोख बथाण प्याड़ल। बिगर बथयां कैते
घुगती अर इस्कुल्या नौना’
थोड़ी हून्दन ? यांका खातिर सब्यूं मा यो जज्बा हूण चैंद, जो ऊंसे काम करै साक।
‘ असल बात ई च काका, कि सबमा वो जज्वा नि हूंद। ‘घुगतिन ब्वाल।
‘घुगती ! एक बात मेरी समझ मा नि आणी कि जब हमारि सरकार पाड़ों मा एक से बढ़िक एक सड़क बणाणी च, त य एक छोटि सि सड़क बणाण मा क्या लगणू ?’
स्वीणा थोड़ी आलो ?’
‘ वी त काका! इनमा बस द्वी रस्ता छन।या त गाँ का मनखि कठा होकी सरकार से सड़क बणौण की मांग करीं या फिर मिल जुलिक अपड़ा आप रस्ता बणा दीं।
‘ त्वी बि घुगती ! कनि बात करदी? लोगों कु काम च रस्ता बणाणू ?’ huकाका ! मिन कतगी जगा गाँ का लोगों तैं श्रमदान कैरिक सड़क बणांदा द्याख।’baहां, कतगी गाँ का लोग इन बढ़िया काम करदा छन, पर सबि एक मेसिक थोड़ी हुंदन? यंका का खातिर सबयूँ मा वो जज्बा हूण चेंद, जो ऊँचे काम करें साक।
घुगती ! एक बात मेरी समझ मा नि आणी कि जब हमरी सरकार पाड़ो म एक से बढिक एक सड़क बणाणी च, त य एक छोटी सि सड़क बणाण मा क्या लगणु?
अरे काका! समझा कैर। जरा सि सड़क बणौण मा कैते फैदा होलु ?” गाँ करीं तै होलु घुगती ! हौरि कैते…?’घुगतिन जोर जोर से पंख फड़फड़ैक ब्वाल, ‘काका ! इतगु छोटु काम मा हाथ डले जाव त बड़ा बड़ा लोग कख जाला…?’ बोलद बोलद घुगतिन उड़ान भ्वार।रैग्ये। काका वींतै देखद देखद सोचदा रेगये।
