रंत रैबार ब्यौरो
उत्तराखण्ड का मौसम आपणा विदै का टैम पर बि रौद्र रूप दिखाणु छ। हाल ही मा हे भारी बरखा अर ढांडु गिन सि प्रदेश का कुछ इलाकों मा भारी नुकसान है। मौसम कु यु बदलदु मिजाज हमतें सोचण पर मजबूर कर्द कि आखिर किलें मौसम अपणु यु रूप दिखाणु छ।
दैवी आपदों का दृष्टिकोण सि उत्तराखण्ड अति संवेदनशील क्षेत्र छ।
अतिवृष्टि जनित भूस्खलन कि घटनों का कारण जख आवागमन प्रभावित होंद वखि यां से प्रभावित लोगु का वास्ता जीवन को खतरा पैदा हवेगि। ग्रामीण भूस्खलन सि उत्पन्न समस्यों का चल्द परेशान्या छन सरकार यूं प्रभावितों हैं मदद पौंछोंद पर यीं मदद तैं हासिल कनौ वृतै क्य-क्या नि कनु पड़द यांकि पीड़ा वी लोग समझ सकदन जो यिनि त्रासदी से संघर्ष कन्ना छन।
दरसल उत्तराखण्ड को पर्वतीय क्षेत्र हर साले मानसूनी काल मा अतिवृष्टि, भूस्खलन बादळ फटणै घटनों से जनित समस्यों से प्रभावित रैंद। हजारों लोग काल का गाळ मा समै ग्येनि, हजारों करोड़ कि सम्पत्ति नदी मा अयीं बाढ़ मा बौगी कख गये क्वी पता न्हीं, हजारों लोगु को रोजगार खत्म वे ग्ये। दशकों बटी चल्न वळि एक व्यवस्था कुछ हि मिनटों मा स्वः ह्वे ग्ये।
बसगाळ का तीन-चार मैनों मा सैकड़ों भूस्खलन कि घटनों का चल्द लोग्वी जिंदगी भारि वे जांद। अबि बसगाळ खत्म नि हवे अर यांसे पैदा समस्या यिथगा बड़ी ह्वे ग्येनि कि बूंसे पार पाणम मैनों लग जाला। यूं घटनों सि प्रभावित गौं वळों कि तादाद बि बढ़द जाणी छे पर सरकारी तंत्र न 2013 कि केदारघाटी वळि त्रासदी से क्वी सबक नि सीखि, यानि आपदा का कारण प्रभावितों तैं मुआवजा, पुनर्वास अर विस्थापन कि नीत्यूं मा क्वी बदलाव नि कर सकि। नतीजतन प्रभावितों तैं मदद पौंछण अर पौंछौण वळि गतिविध्यों मा क्वी गंभीरता नि ऐयि।
यीं बात मा द्वी राय नि कि दैवी आपदों पर कैको बि जोर नि चल सकदो पर यां से पैदा होण वळा दर्द अर समस्यों तें कम जरूर करे जाणा प्रयास हवे सकदन। जन कि दैवी आपदा प्रभावितों तक त्वरित इमदद पौंछौणु शामिल छ। वृंका पुनर्वास कि त्वरित व्यवस्था करे जाणु बि यीं नीति मा शामिल होण चयेणू छ। अब तक पहाड़ मा घटित प्राकृतिक आपदों से प्रभावितों तैं मदद पौछौणै नीति पर नजर डाळे जाव त पता चल्द कि राज्य मा आपदा का लिहाज से संवेदनशील गौं कि संख्या काफी छ। अबि तक स्थिति या छ कि अगर एक परिवार मा चार भै रंदन त मुआवजा परिवार का हिसाब से वितरित करे जांद न कि अलग-अलग रैण वळा चार परिवारों का हिसाब सि। यानि समुचित क्षतिपूर्ति नि मिल सकदी। हालांकि यीं स्थिति को अहसास सिस्टम तैं अब होणू छ। दे लिहाज से आशा करें जै सकद कि नयि नीति य व्यवस्था शामिल करे जैलि। यानि अलग-अलग रैण वळा भायूं तै अलग-अलग क्षतिपूर्ति वितरित करे जैलि। सरकार तैं चहेंद कि आपदा प्रबंधन अर न्यूनीकरण का वास्ता आधुनिक तकनीकी को समावेश होणु सुनिश्चित करो ताकि कम से कम लोग दैवी आपदों से प्रभावित हवे सकन। पुनर्वास नीति मा व्यवहारिक संशोधन अर मानवीय दृष्टिकोण शामिल करे जाणै जर्वत बि छ।
पुनर्वास जनि योजना वास्ता बड़ा बजट कि जर्वत होंद ये वास्ता यीं नीति कि संहितों मा किंतु परंतु कि गुजैश नि होण चयेणी छ। यांसे यीं तें लागु कनमा त मदद मिललि हि प्रभावितो तैं इंसाफ तेज गति से हवे सकलो। निथर य बात तै छ कि पुनर्वास कि आस मा लग्यां प्रभावितों कि जग्वाळ लम्बी हौर लम्बी होंद जैलि।
दैवी आपदाओं को पूर्वानुमान त हवे नि सकदो यांसे पता चल्द कि झणि कब अर कखि बादळ फटद अर कथगा गौं ये से प्रभावित हवे जांदन। यानि नुकसान कि पूर्ति शत प्रतिशत त होंदी नी छ पर जथगा बि मिल वांमा देरी नि होण चयेणी छ। यांखुण सरकारी तंत्र की उत्तरदायी भूमिका मा गंभीरता को समावेश राव त प्रभावितों तै त्वरित मदद उपलब्ध करौण मा आसानी रैलि।
