बांज कु अक्षेणू हे बीरा बल बांजा कु अक्षेणू भलु बुरु जु भी ह्वावु ऐक दिन अक्षेणा मा धरेंण
अक्षेणा भागम दैबन पत्नी किले लिखी इन लेख कर्मू का भोग जन जैका राला वनी फल पौंण वेन
अहम बहम फतुर करै देंद होस हवास जीणू चयेणी बुद्धी विवेक देयूं च दाता भकलपनम उम्र नी गंवोणी
मान प्रतिबंध संस्कारवी समुदाय समाज नाक जन होंद उमर साल्डी जांद मनखी की लाज शर्म नाक जन होंद
जीवन का रौला धौलौं मा होंदी रेंदन उलखणी बत सूण ईमान धर्म से बडु नी क्वी मुंथम बात सार की जरा गूण
छंयलु कु काम चुगलौंणू भकलै कि इनै उनै बात सरौणू सधैं कु पतु नि कै तैं बात कु बतंगड़ बणै बदनाम करणू
अहम बहम फतुर करै देंद होस हवास मर्यादम रै जीण खानदानी संसकारु कु पतन करै या जिन्दगी नी कटेण
दाना सयेणा ब्वे बाबा चचा सोडा भै’ बंद आन बान सान छोप जौंकी छत्र छायाम पल्यां बढ्द्यां नि कन अपमान
अक्षेणा तैं क्या लेणू देणू कैसे धरे अक्षेणम वेन कणेण खुट कर्मूवी सजा ये जीवनम देर सबेर कर्मू की भोगेण
झूठा पांव नि होंदा बोदा छाया दाना सयेणा टक लैकी सधैं छपै छुपये नि सकेंदी लाख परदौंम देखा छुपैकी ।।
* भगवती जुयाल गढदेशी
