रंत रैबार ब्यौरो….
(संदीप गढ़वाली )
म्यार ड्यारम किताबों कु चट्टा लग्यूंच । हिन्दी अंग्रेजी गढ़वळि गीत संग्रह कविता संग्रह कानि संग्रह । कुछ त पैंसोंमा लीनि कुछ सप्रेम भेंट मा ऐनि ।
अब सवाल योच कि इतगा कितबि धना कख छन ? घार वळि ब्वनी जब कामा का नि छन त कबाडि मा दे द्यावा । मिन ब्वाल चुप रौ यार यांमा बटि कुछ त अज्यूं मिन पैढ़ि बि नि छन । वीन ब्वाल ह्या नाराज नि ह्वाओ म्यार ब्बलणौ मतलब च कि जो काम का छन ऊंथै धैरो बकै न ।
मिन ब्वाल ई सब्बि काम का छन । वीन ब्वाल जु अच्छा छन ऊंथै धारो याने जो पढ़ण लैक छन । मिन ब्वाल जौंका बि लिख्यां छन पढ़णु खुणै ही ल्याख्यां छन । कनमा पता चलौ बिना पढ़यां कि को बढ़िया च ?को रखणु च ?
वीन ब्वाल मि बतान्दु दस मिनट मा । वीन चट्ट कबाड़ि वळा खुणै फोन बल भैया जरा इनै आना हमारी बिल्डिंग में । वो बुर्या लेकन ऐ अर वैन सब्बि किताब ब्वर्या मा धैरि अर तोलि कन ब्वनू बहन जी सोलह किलो हो गये आपको तीन सौ बीस रुपये देता हूँ ।
इतगा मा मि औ अर मिन वैक सांकि पखड़ी तेरी हिम्मत कैसे हुई इन्हे लेजाने की ? तू जानता क्या है किताबों के बारे में ? इनमे से बहुत सी किताबें तो बहुत काम की है पर तू ठहरा कबाड़ी तुझे क्या पता ?
अब वै कबाड़ि कु आत्म सम्मान जागि गे वैन सब्बि किताब भ्वीं मा अखणें देनि बल छांटो अपने काम की किताब।
मिन सबसे पैली अपणी किताब उठै वैन ब्वाल क्य तुम थैं पता नीच कि तुमर क्य ल्याख्यू ? अर कन ल्याख्यू । मिन ब्वाल पता च । त बल धारो बुर्या पुटुग । मिन हैंका किताब उठै त वैन ब्वाल य त भौत पुराणी लगणींच । मिन ब्वाल अज्यूं तक मि पैढ़ि नीच । बल भैसाब जब तुमने दस साल में ये किताब नही पढ़ी तो अब खाक पढ़ोगे । धारो तैंथै बि बुर्या पुटुग । मिन एक हौरि किताब उठै वैन ब्वाल तुम तै लेखक थैं जण्दा छौ ?मिन ब्वाल हां । भारि अणमिलु च जै कै दगड़ि नि बच्चांदु ‘ । मीथै घमण्डी लगद । बल भाई साब आपन वैकि जु छवि दिल मा बसै यालि अब तुम वैकी किताब कबि पैढ़ि नि सकदा क्योंकि तुम वैका साहित्य से जादा वैथैं छौ दिखणां इलै धारो बुर्या पुटुग तुमरि क्वी कामक नीच ।
मिन एक हौरि किताब निकाळी अर बोली किताब जनि बि हो पर यु आदिम भलु च बोल चाल मा व्यवहार मा । कबाड़ी वळन झट्ट वा किताब लूछि अर बुर्या पुटुग धैरि दे । मिन ब्वाल अबै त्वैन इन किले काई ? बल साब जखमा एक पाठक का तौर फरि तुम किताब से अधिक वैका लेखक की वाह वाही करण बैठि जंदौ उखम सिर्फ साहित्यकार ज्यूंदु रैन्द साहित्य खत्म ह्वै जान्द । अर जु खत्म ह्वैगे वो तुमर क्ये कामकु ?
इनि करदा करदा वैन अपणां तर्क देकि सैब किताब बुर्या मा भोरि अर ब्वनू ल्यो एक सौ साठ रुप्या ।
मिन ब्वाल इन बता अबि तु तीन सौ बीस रुप्या देणू छाई अर अब वैका अद्दा किलै ?
बल मिन त्वै बतै नि छन अच्छी अर बुरी किताब कन छंटदन । मिन बतै नीच कि किताब की भैल्यू कनमा त्वलेन्द ।
फिर वो कबाडि वळु रुंण बैठि ग्याई । मिन बि दरिया दिलि दिखै अर अपणी दस बारह किताब होरि देनि अर ब्वाल रो न यार बता क्य बात च ?
बल साब जब बटि साहित्य मा तु मेरि पीठ कन्या मि तेरि कन्योलू । तु मेकु वाह वाह कैर मि त्वैकु करलु । तुम म्यार नौ जपो मी तुमर जपुलु ।
वैदिन बटि सिर्फ साहित्य कार दिखेणा छन मंचों मा कार्यक्रमों मा साहित्य त ह्यारां य त कूंणा प्वडयूंच य त कखि कबाडि मा त्वलेणु ।
किलैकी कि साहित्य थैं लोग पैंणु पल्तिरु कना बान पढ़दन वैन मेरि नि पैढ़ि त मि वैकि किले पैढु ? य वो हमर गुट कु नीच त हम वैकु किलै पढ़ौ ? इनि भौत बात छन अर ल्यखेणू बि साहित्य सिर्फ अपणु नौ का बाना च कि फलाने के दस किताब फलाने के छः बस । अर सूणो जतगा किताब तुमरि लाइब्रेरी मा नि होगी जितनी मेरे काबाड़ी के गोदाम में है । भैसाब अब साहित्य न स्वयं हित लिखेंद । बोलि भाषा बचाण का बाना ना बिकाण का बाना लिखेंद । ज्यादा लोग फ्री की किताब मंगण वळा छन किताबू फरि रेट त सुद्दी रैन्द ल्याख्यू । ले देकि एक सैल्यकार मा आखिर दौं कुछ नि बचदु इख तक कि कखिम दस्तखत कना खुणै बि वैथैं कलम मंगण प्वड़द ।
मिन ब्वाल यार तु एक पैसा न दे पर इन बता त्वै इतगा जानकारी कख बटि च साहित्य की इतगा समझ ?
वैन ब्वाल पैली मी भि सैत्यकार छाई फिर पब्लिकेशन कु काम काई पर जब मिन लोगु मा किताब मंगिन त कैन नि दे क्योंकि मै ठहरा छोटा सैत्यकार अर वो लोग ठहरे बड़े ।
फिर मिन कबाड़ी कु काम काई इख कैमा किताब मंगण नि प्वड़दी लोग अफी दिन्दा । अर मीथैं ईं बात कि खुशि च कि मि तोल कु भौ ही सै पर किताब खरीदणू छौ । अर ठंडु मठु कै पढ़दु जबरि ज्यू ब्वाद ।
कुल मिलै की आजै सचै ई च ।
