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रंत रैबार ब्यौरो…..
पिछला कति सालो बटि उत्तराखण्ड खास करिक देहरादून का सड़क्यूं का किनरा लगा डालौ तैं विकास का नौ पर बलि दियेगि। यू डाळों कु अंधाधुंध दोहन सि पर्यावरण प्रभावित होणू छ वखि यख कु वाटर लेवल पर बि प्रभाव पड़णु छ।
एक ओर त सरकार सात मोड ऋषिकेश का जंगल मा डाळा करण मा लगी छ अर हैंकि तर्फ वृक्षारोपण कु लक्ष्य रखे जाणू छ। डाळा लगौंणो लक्ष्य हर साल निर्धारित करे जांद अर ये साल बि बण्यू छ। यानि हर साल करोड़ों डाळा लगौणौ मुंड कपाळ करे जांद। लाखों न करोड़ों को बजट बणद। विभाग आंकड़ा तयार कैरी बजट खर्च कि स्ट्रेटजी तयार कर लेंद। यानि हर साल अगर करोड़ों कि तदाद मा डाळा लगै जांदन त कथगा अगला साल को मानसून देख सकदन ! शैद विभाग युं आंकड़ा पर माथापच्ची नि कन चाहंदो। दरसल वन विभाग का पास एक साल तक ज्यूदा डाळों को रिकार्ड हि नि होंदो। यूं डाळों कि मॉनीटरिंग कन वळो क्वी नि होंदो। अगर क्वी कर्मचारी होलु बि त वेळा सर्वेक्षण को क्य भरोसु। अकसर यिना कर्मचारी य त ध्याड़ी पर रखे जांदन या फिर संविदा आधार पर। यिनि स्थिति मा वूतै फालतू माथापच्ची कनै क्य जर्वत छ। वो कर्मचारी जो 50-60 हजार तनखा ल्हेंदन चूंकि ड्यूटी त लगदी नी छ कि साल भर तक ज्यूंदा डाळों को सर्वेक्षण कनमा। वो संविदा य फिर ध्याड़ी वळा कर्मचार्यो तैं आदेश दे कि वेंकै सर्वेक्षण पर आश्रित रैण पड़द। यिनि स्थिति मा पांच-दस हजार ल्हेण वळा व्यकर्य कर्मचारी बि त सर्वे का आंकड़ा सही देला यांकि क्या गारंटी छ।
दरसल द्यखे जाव त सरकारी विभागों कि व्यवस्था संविदा य ठेका पर लग्यां कर्मचार्यों का भरोसा चल्नी छ। अधिकारी फील्ड स्टाफ कि रिपोर्ट पर आंकड़ों कि रेल चलौंदन। वो एसी कमरों मा बैठी सरकार तक यि बोगस रिपोर्ट प्रेषित कर दिंदन। बस यां पर हि आधारित आंकड़ों पर मंत्री लोग बड़ा बड़ा दावा कैरी जनता तैं विकास कि गति से अवगत करौंदन। अगर हर साल एक करोड़ डाळा लगदन त 50 फीसद बि अगर अगला मानसून तक ज्यूंदा रै जांदा त जमीन मा खुटु धरणै जगा बचीं नि होंदी। यिना वृक्षारोपण अभियान को आम जनता तैं क्य फैदा हवे सकद। अभियान त पर्यावरण सुरक्षा का नौं से चलै जांद पर क्य अभियान सार्थक होंद, शैद कबि न। यांसे ठीक छौ कि पहाड़ों मा परती खेती योग्य जमीनों मा डाळा लगै जांदा। करोड़ों का बजाय लाखों मा हि सही अगर हर ग्राम पंचैत स्तर पर लोगु का पुंगड़ों मा वखै जलवायु का मुताबिक फलदार डाळा हि लगै जांदा त जादा उचित होंदो।
होण यो चयेणू छौ कि जंगळों मा डाळा लगौणा बजाय गौं का लोगु तें विश्वास मा ल्हेकि वृंका पुंगड़ों मा वृक्षारोपण होंदो अर चूंकि देखभाळ को जिम्मा वूतें दे दिये जांदो त जादा फैदामंद होंदो। यांसे जख खरड़ा पुगड़ों मा डाळों से हैर्याळी होंदी। फलदार डाळा लगण से खेत मालिक कि आर्थिकी तैं आधार मिल्दो। यांसे वृक्षारोपण का आंकड़ा बि अपडेड होलो। चूंकि खेत मालिक डाळों तैं अपणु समझी चूंकि रक्षा को जिम्मा ल्हेलो। यिथगै न डाळा लगौणो खड्डा तयार कन से ल्हेकि डाळों कि रक्षा कन तक बूंको जिम्मा होलु। आज पलायन का कारण पूरो पहाड़ खेतीपाती से विरत होयूं छ, वो पुंगड़ा डोखरा जो कवि खूब अनाज पैदा कर्दा छा वो आज बंजर स्थिति मा छन। हर बसगाळ मा तेज बरखा होण से जमीन कि उपरली पतर उपजाऊ होणा गुण से वंचित होंद जाणी छ। आज पहाड़ का जनप्रतिनिधि बि पलायन कि सोच से ओतप्रोत छन। वो बि एकदां चुनौ जीती पिछनै द्यखण नि चाहंदा, वो राजधानी य फिर मैदानी क्षेत्रों मा कोठी-बंगला बणैकि रैणु पसंद कर्द। यिनि स्थिति मा आखिर कैन ख्याल कन पहाड़ का विकास को। सरकार तैं चयेंद कि निरूद्देश्य वृक्षारोपण का बजाय पहाड़ी खेतों मा फलदार डाळा रोपणो अभियान चलाव। तबि सहि मायना का वृक्षारोपण कार्यक्रम की सार्थकता छ.
