रंत रैबार ब्यौरो…..
उत्तराखण्डै जैव विविधता वळा ये पहाड़ी प्रदेश कि जड़ी बूटी प्रदेश का रूप मा पछ्याण छ। यख तस्करों का माध्यम से जड़ी बूट्यों को बेहिसाब दोहन होणु छ। यो हि न सरकारी स्तर पर बि यूं वनस्पत्यों का दोहन मा वैज्ञानिकता नि अपणै जांदी। य स्थिति तब छ जबकि यूंका संरक्षण खुण एक अलग हि व्यवस्था करीं छ।
वनस्पत्यों का क्षरण मा सरकारी मशीनरी अर जिम्मेदार विभागों कि लपरवै बतै जांद। यानि फंडो फूंका होण द्या अवैज्ञानिक दोहन। हमर खीसा बटी क्य जाणू छ। सरकारी मशीनरी कि जब तक य गैर जिम्मेदाराना सोच नि बदलदी तब त यखै डाळी बूट्यों का ज्यूंछी रैणै क्वी गारंटी नी छ। प्रदेश का 71 प्रतिशत भू भाग जंगळों सि आच्छादि छ। यख वनस्पत्यों कि कुल संख्या 4700 सि बि जादा बतै जांद। यांक अलावा वन प्रबन्धन योजनों मा 920 प्रजाति कि वनस्पति हौर शामिल करे ग्येनि।
डाळा बूटों धरती मा हैर्याळी फैलौणो त छै हि छ बल्कि यूं मुद्दे जादातर आयुर्वेदिक औषध्यों को उत्पादन बि करे जांद। यो समझा कि आज पूरी दुन्य मा उत्तराखण्ड वनौषध्यों खुण बि विख्यात छ। यूं कै दम पर आयुर्वेद को पूरा तंत्र जुड्यूँ छ। यूंकै दम पर आज आयुर्वेदिक औषध्यों सि न सिर्फ भारत वरन् देश का दर्जनों देशों का बजार भर्या छन। ये बीच भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण सि कुछ महत्वपूर्ण तथ्य समणि अयां छन। जैव विविधता का धनी उत्तराखण्ड मा 16 प्रजातियों का अब दर्शन बि मुश्किल सि होंदन।
सर्वेक्षण मा बतै ग्ये कि बजार मा यूं वनस्पत्यों कि उच्ची कीमतों का चल्द धन कमौण वळों खुण उत्तराखण्ड एक खज्यना तरां छ। कै बि घास य डाळा का औषधीय महत्व सुणदै लोग यूंको बेहिसाब दोहन शुरू कर देंदन। यो हमरा प्रदेशवास्यों को दुर्भाग्य छ कि आय का मामला मा कमजोर ये प्रदेश का हुक्मरानों न जड़ी-बुट्यूं का माध्यम से राज्य कि आमदानी बढौणा वारा मा क्वी सोच विकसित नि करि। अगर सरकार कि देखभाळ मा वनस्पत्यों मा शामिल जड़ी बूट्यों तें चिन्हित कैरी चूंकि अगर प्रोपर फार्मिंग करे ग्ये त प्रदेश अपण बजट तैं लाभ को वणै सकद।
सरकार तै ऐ मामला मा अब सतर्क होण होलु किलैकि वन बहुल उत्तराखण्ड मा जैव विविधता तैं खतरा बण्यूं छ। वनस्पति विज्ञान्यूं को मत छ कि अगर तत्काल यूतैं संरक्षित कनै दिशा का कारगर उपाय नि करे ग्ये त य खतरा और बढ़ बि सकद।
