(भगवती जुयाल गढदेशी)
ब्रह्मलोक स्वर्गलोक मृत्यू लोक छीं सतपंथ पित्रू तर्पण दे कन्यागतु मा ह्वे जाणू अरिहन्त
सुनिन्द निं रयां मैत्यूं सूणा चुचौं जागी जा पुर्वजू याद कौरा संस्कार छीं तर्पण दान द्या
पित्र, पक्ष छीं पित्रू तर्पण दे अपणु धर्म निभा सत कर्मूवी घाण तपै नौ की रोज पूड़ी द्या
बोलदन ममा सारी क्वी मुंथा मा पौंणु नी जख पित्रवी पूजा हो पित्र सारी देवता नी
जड़ मौली डालू बणी देंद मनख्यूं सदनी छाया दोष गौन हत्यां नि सतांद जख पित्र छाया
पाली पोषी औलादु पै रै जांदी मनखी लालसा
कन्यागतू मा पित्र तरपणै पूड़या रेंदन प्यासा
पित्र पक्ष मा बामणू याद करी दस्तूर तैं निभावा नीत नियम दान पुन करी तीर्थं फल पावा
खतम ह्वेगीं संस्कार जमनू मॉडन ह्वेगी चुचां गुसैंण सिख्वा सौरयूं कन्या जिमौण लैगी देखां
घुत्त्त्वा बाबा तित सास सोसरै पूड़ी रखण तुमन तु रखी दे देर होणी ध्याड़यू हरजा होण दिन
क्या होंद या तित वित मिन पैली नी सूणी कैमा ब्वे बाब कभी पूड़ी धरद नी दे खनी बालपन मा
गंवड़या छयीं गंवड़ों की बत गंवड़ौ रैण दे छोड़ गैर हाजिरी होण साब कड़क मि जाण दे छोड़
मुंडेसू बांधी गुसैण छज्जा कोणा बैठी सोचणी याद कै मैत्वड़ा की यादू मा कखी ख्वेकी समलणी
संस्कारवान घौर बाबा न टिपडू जुड़ै बामण मा तेरू क्या मेरू क्या घरू घरू तरपणै लड़ै देसु मा ।।
