(पयाश पोखड़ा)
बांजि पुंगड़ियूं मा जख्या जमैक ऐग्यौं ।
अपणि जैजाद कांडौ मा थमैक ऐग्यौँ ।।
स्वीणौ का जिलाणम रोज को अळझ, सब सुपिन्यां समोदर मा समैक ऐग्यौं ।
फूल न पत्ती मेरा कुछ काम नि आया, कोंपळ कुटमणा घाम मा घमैक ऐग्यौं ।
मेरा जुरम को निसाब अब वी कारलो, बगत का हाथुम हथकड़ि थमैक ऐग्यौं ।
स्वीणौ का जिलाणम रोज को अळझ, सब सुपिन्यां समोदर मा समैक ऐग्यौं ।
फूल न पत्ती मेरा कुछ काम नि आया, कोंपळ कुटमणा घाम मा घमैक ऐग्यौं ।
मेरा जुरम को निसाब अब वी कारलो, बगत का हाथुम हथकड़ि थमैक ऐग्यौं ।
जिंदगिभर जै दरवजम फिटकार मील, आज फिर वीं देळिम मुंड नमैक ऐग्यौं ।
दर्द पीड़ा की सुणदरि गुसैंण नि दिखे, गुठ्यारा गौ का कीला फरै रमैक ऐग्यौं ।
छोड़ नि पूछ मीथें कि गौं किलै छाड़, मि भटुळि खुद अर पराज कमैक ऐग्यौं ।
माया लगाण कतै सौंगु नि हूंद ‘पयाश’, घुघरांदि आग दगड़म हथ डमैक ऐग्यौं ।
