रंतरैबार व्यूरो
नई दिल्ली । ऐतिहासिक ‘देवलगढ़’ उपन्यास का लेख्वार अर गढ़वाली कान्यूं का सल्ली ‘कमल रावत’ तैं मासिक साहित्यिक संगोष्ठी (दिल्ली) द्वारा गढ़वाल भवन दिल्ली मा दिसंबर, 2025 को पैळो ‘साहित्य सम्मान’ दिये गे। यनी अग्नै भी वरिष्ठ साहित्यकारों/ समाजसेवियों/भाषा, संस्कृति अर साहित्य प्रेमियों का बरगदी संरक्षण मा हर मैना एक साहित्य सम्मान दिये जाणो संकल्प छ।
यीं संगोष्ठीऽ शुर्वात गढ़वाल भवन मा स्थापित श्रीलगुळी का सान्निध्य मा डा० सुशील सेमवाल द्वारा वैदिक मंत्रोच्चारण से ह्वे। पैलो सत्र मा बयोवृद्ध साहित्यकार मंगतराम धस्माणा जी कि पोथी ‘मेरे नाटक मेरी कविताएं’ पर समीक्षात्मक परिचर्चा से हे। अपणा बीज वक्तव्य मा प्रदीप वेदवाल जीन बोलि कि लिख्वार का नाटकों
अर कवितौं मा यथार्थ का साथ साथ आदर्शवाद भी दिखणो मिलद। मास्टर जी की मार’ नामक कविता को वाचन कर्दा बग्त वो अपणा गुर्जि कि मार तैं याद करी खुद भी भौती भावुक ह्वे गेनि। सुप्रसिद्ध नाट्यकर्मी खुशहाल सिंह बिष्ट जीन मुख्य वक्ता का तौर पर ‘कालो मुंड’ नामक नाटक
साठै दसकै मा प्रयुक्त सन पचास शब्दावली कालो मुंड यानी नौनाऽ ब्यो, य टक्कौं ब्यो का बारा मा बतै कि वै समै म् जैकि जतगा जादा नौनी होंदा छै, वै तैं बड भागवान अर धनवान मणे जांदो छ रिवाजी यन्नु छौ कि कै बि गरिब-गुरबै व नौनी का बुबा तैं मुंहमांगा कळदार अर गैणा पातयों देकि योग्य-अयोग्य अणम्यळा नौना दगड़ ब्यो करै देंदा छ्या समाजाऽ रसूकदार या फिर क्वी बिच्वळ्या। कहावत बि छै कि नौनी अर गौड़ी तैं त कैं बि कीलु फर बांधि द्यो वा कखि नि भगण्या। ये तरां से वून हौरि बि द्वी नाटकों ‘उद्यं’ अर ‘ओबरा – पांडौं’ पर अपणि सारगर्भित बात रखी। अन्य वक्तौं मा प्रो० हरेंद्र असवाल, डॉ० सुशील सेमवाल, जगमोहन सिंह रावत ‘जगभोरा’, अजय बिष्ट जी की समीक्षात्मक विवेचना का बाद धस्माना जीन उपस्थित सब्या लोखूं को हृदै से आभार व्यक्त करी।
संगोष्ठी का दूसरा सेशन मा खुशहाल सिंह बिष्ट, जबर सिंह कैंतुरा, अजय सिंह बिष्ट, डॉ हरेंद्र सिंह असवाल जनौ का बरगदी संरक्षण मा साहित्य प्रेमियों की करतल ध्वनि की औ-भगत का साथ कमल रावत तैं ‘साहित्य सम्मान’ दिये गे। सम्मानपूर्वक प्रशस्ति, अंगवस्त्र अर पत्रम् पुष्प अर्पित करेगे।
यांका बाद कमल रावत की रचणा संगसार पर खासी लंबि चर्चा ह्वे। कमल की कान्यूं पर जगमोरा ल बतै कि कमल का रचणा संगसार तैं भलिकै बिंगणा खुणै आप तैं अपणा दादा-दाद्यं नाना-नान्यूं की खुछळि मा बैठि फिर से एक बाळा जनु बणिकै आणा-पखाणों की दुन्या मा जाण प्वड़लो । शब्दों की सल्लि बुनौट तैं समझणु टेलर बर्डे टेलरमेड घोळे बरीक मजबूत अदभुत रचना संगसार तैं समझण प्वड़लो। कमलव्यूह तैं समझण प्वड़लो। बल कमल रौतै कुंडली क्या देखण ? पंचतंत्र जनु कान्यूं की तरां क्वी भी पांच कान्यू की मुंडळी देखिल्या। जनकि ‘नेगी मरो नेगचरी नि मोरद’, ‘खादी पल्टन’, ‘एकी घाटा मुरदा’, ‘माच्छा मच्छल्यांण’, अर’ अजगर’। नथिर कमल रौत तैं दियां मॉडल’ प्रशस्ति पत्र’ तैं हि पैढ़िल्या। ठुलो द्यब्तौ ठुलो छत्र, अर बड़ो प्रशस्ति पत्र। हां कामना करेगे कि जरूर कै दिन कमल अपणा हजार कान्यूं का कौळझुम्फा (ब्रह्मकमलाऽ गुलदस्ता) तैं श्रीनगरा कमलेश्वर धाम मा सिराला। ‘ हजार ग्राम हजार धाम’ की परिकल्पना तैं साकार कन मा अहं किरदार सिद्ध होला।
