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रंत रैबार ब्यूरो …..
भीष्म कुकरेती
भौत कम इ एक इ भोजन क हिस्सेदारों म दगुड़ दिखे गे। किन्तु भौत समौ परिस्थिति प्रतियोगियों तैं मित्र बणैं दींदी प्रकृति।
एक पहाड़ी गाँव म एक जोगी नामौ कवा छौ। सि आनंद से गाँव म अपर परिवार , स्वार भारों दगड़ गाँव म इना उना उड़नू रौंद छौ। रात कै डाळ म से जावो अर सुबेर म गाँव म बीज , गाँव वळों खत्युं भोजन , खत्युं बीज , खेतों म कीड़ा मकौड़ा , मर्यां मूस , खरगोश आदि तैं खैक जीवन बिताणु छौ। कभी कभी पर कम समय , गांवक गोरुं क चिंचुड़ या अट्टा पर हाथ मार दींदो छौ। गांवक लोक तो कवों तैं ना प्यार करदा छा ना ही घृणा पर लोक कवों तैं गांवक ही लोक जन समजदा छा अर्थात आवश्यक अंग जो गांवक सफै म सहयोग दींदान।
ये गाँव म कवा पर कभी कभी कवों तै गरुड़ उठैल ली जांद छा या कबि कबि घर्या कुकर या बिरळ कवों तेन मार दींदा छा।
यु कवा बि आनंद म छौ कि एक दिन जोगी हौर कवों दगड़ मथि पहाड़ी ओर उड़ी गे कि तबारी बर्फीला तूफ़ान ऐ गे। जोगी तो बिंडी समय गांवक आस पास इ रौंद छौ जख इन बर्फीलो तूफ़ान नि आंद। जोगी को इन बर्फीलो तूफ़ान को पैलो छौ तो वैक समज म नि आयी कि क्या करण किलैकि अनुभव ही नि छौ।
जोगी कवा प्रकृति चेतना अनुरूप राई। तूफ़ान जोगी तैं उड़ांद उड़ांद जंगी बर्फ से ढक्यूं अलास्का जन जगा ली गे। तख कवा एक कुंळै डाळ म फंस गे अर बच गे।
जब तूफ़ान थम गे अर मौसम सामान्य ह्वे तो कवा न पायी कि वो बिलकुल अजाण स्थल म ऐ गे। एक दिन तो कवा इना उना उड़ कि कुछ खाणों मीलो। पर इख हिम जंगल म हिम ही हिम छौ। रेडी मेड गाँव जन भोजन नि छौ। तो कवा भोजन हेतु समस्याग्रस्त छौ। वै तैं तयार भोजन चयेणु छौ। समिण खरगोश , मूस दिखेंद छा अर जोगी केवल कांव कांव ही कर सकुद छौ , जोगी तैं खरगोश या मूस मरण नि आंदो छौ।
दुसर दिन बि वो बिन भोजन का ही राई। जोगी एक बांज क फौंटा म बैठ्युं छौ।
इना हिम जंगल को एक स्याळौ परिवार से एक युवा स्याळ भोगी बिगळे (अलग ) गे अर भगद भगद ये हिमाच्छादित जंगळ म ऐ गे । वो शिकार मरण तो जणदो छौ पर अबि तक वैन शिकार खुज्याण नि सीख छौ। एक द्वी दिन से वो घुमणु राई किंतु शिकार नि खोज साको। शिकार हेतु भोगी अटकणु छौ। अटकद -अटकद भोगी वे ही पेड़ तौळ खड़ ह्वे गे। मथि फौंटी म कवा न कुछ दूर पख्यड़ म एक बड़ो मूस द्याख। मूस पर स्याळौ नजर नि जै सकदी छे। जोगी कवा अपर स्वभाव अनुसार भोजन देखि कांव कांव करण लग गे। तौळ स्याळ तैं कवा क ध्वनि से कुछ अटपटा लग वो थोड़ा मथि तपड़ा म गे तो वै तैं मूस दिखे गे। स्याळ दब्युं पांव गे अर धड़ाक से वैन मूस मार दे अर चीयर फाड़ी खाण लग गे। स्याळक मूस खाण म मोसाक भौत सा अंग भीम पोड़दा गेन अर जोगी न सी मांश खै।
संभवतया दुयूं तैं समझ म ऐ गे कि दुयुं तैं एक हैंक से लाभ हूणु च।
अब द्वी प्राकृतिक दगड्या बण गे छा। कवा डाळ म बैठि मूस , खरगोश आदि देखि उखम जैक कर्र कर्र बसद छौ अर स्याळ घात लगैक शिकार मार दींदो छौ। स्याळ क खाण म मांश भ्युं पड़ जांद छौ जो कवा कुण पर्याप्त छौ।
दुयूं क जीवन सरलता से चलणु छौ कि एक दिन स्याळ भोगी तैं कै युवती स्याळणै गंध मील तो स्याळ स्याळण खोज म दुसर बौण चल गे। कवा बि अब हिम क्षेत्रौ जणगरु ह्वे गे छौ। वैन द्याख कि दूर तौळ घाटी म क्वी गाँव च तो वो जोगी कवा वे गाँव की ओर उड़ गे। संभवतया वै तैं बि कवी की आवश्यकता पड़ गे हो।
