रंत रैबार ब्यूरो……
नई दिल्ली। गढ़वाल भवन, दिल्ली मा मासिक साहित्यिक संगोष्ठी सुफल हेइ। हिंदी का जण्यां-मण्यां हस्ताक्षर जस्यळा कवि अर गजलकार ललन कुमार बुड़ाकोटी ‘प्रणव’ (ग्राम-चाई, पट्टी- कौड़िया, जिला – पौड़ी गढ़वाल, उत्तराखंड, हाल-फिलाल कोटद्वार का रैबासी) तैं राष्ट्र भाषा हिंदी साहित्य की श्रीवद्धि मा उत्कृष्ट जोगदान खुणि पांचवों ‘साहित्य सम्मान’ प्रदान किये गे। दिसंबर मा ‘देवलगढ़’ उपन्यास पर गढ़वाळी प्रेमचंद कमल रावत, जनवरी मा ‘मौर – मौर्याण, मुखौटा नाट्य संस्कृति विदुषी डॉ० कुसुम भट्ट, फरवरी मा साहित्यकार व विज्ञान मा नौचार का सल्ली कृपाल सिंह शीला तैं गिरै कौधिक की सौ-समाळ अर ‘सौ-सिंगार’ खुणि अर मार्च मा जौनसारी भाषाविद रमेश चंद जोशी तैं साहित्य अर जौनसारी भाषा शब्दकोष का
वास्ता सम्मानित कर्ये गे छौ।
गढ़वाल भवन, दिल्ली मा थप्यों श्रीलगुळि (मनीप्लांट) का सान्निध्य मा सुरेंद्र कुमार जुयाल का मांगळ गीत – ‘दैणो होयां खोळी का गणेशा!’ से आजोजन कु श्रीगणेश ह्वे। पैला सत्र मा पजल जातरियों
दिनै एकेश्वर – दंगलेश्वर, सतपुली क्षेत्र विशेष की आठ्वों अष्टधाम पजल जातरा पर जयपाल सिंह रावत जीन यात्रा हर पड़ौ पर अपणि समलौण्या सारसगोर्या बात रखी। पजल जातरी सुशील बुड़कोटी ‘शैलांचली’ जीन हजार ग्राम हजार धामों की परिकल्पना अर अज्यू तलकै 64 धामों कि जातरों का बौऽआयामों पर महत्त्वपूर्ण बात रखि। दूंन बतै कि हर धाम की यात्रा मा हजारों लोग सिदा तौर पर जुड़णा छन; अर यर्योऽ तरां से परत्यक्ष अपरत्यक्ष हजारों लोग पजल साहित्य से जुड़ि गेनि। लगभग 32 पजल गीतूं कु आणु पजल साहित्य की
श्रीवृद्धि मा एक नयो आयाम छ। दुसरा सत्र मा अनूप रावतै कविता पोथी ‘बात हौरि च’ पर समीक्षात्मक
साहित्यिक चर्चा हे। जगमोरान बतै कि युवा साहित्यकार अनूप रावत की पैलि पुस्तक ‘ज्यू ब्वन्नु च’ का विमोचन का टैम से ही वो गढ़वाली भाषा साहित्य की तरपां प्रेरित हेनि। पोथी की भूमिका लिख्वार युवा साहित्यकार आसीस सुंद्रियाल द्वारा हि वृंकी पैलि काव्य पोथि ‘फाग्णै फिक्वळि’ की भी भूमिका लेखों छ। कखि न कखी दुया दुयूंन पजल साम्राज्य की नींव धरै कु काम करि। यना मा यींऽ पोथि छाळ छांट करण तऽ औपचारिकता मात्र छ। बतै कि अनूप की काव्य पुस्तक चार खंडों मा छन, पैला खंड मा गजल दुसरा मा कविता, तिसरा मा गीत अर चौथा मा मुक्तक छन। ऊंकी 38 कवितों कि खासियत यऽ छ कि हरेक कविता को सशक्त टैटल बि कवितै पैलि लैन की सशक्त सुर्वात से लेयूंछ। जो पाठक तै पूरी पोथि पढ़णा खुणि मजबूर करदन।
पयाश पोखड़ा न बोलि कि अपणि बोलि भाषा मा ल्यखणु पड़णु अर स्वचणु अर यो सब एक पोथी का रुप मा आणि वळि पीड़ि बैं एक दस्तावेज की विरासत सौंपणु अपणा आप मा एक दान ही ना बलकन अपणि? कौम खुणै एक धरम निभाणु बि छ। जन मशहूर शायर जनाब कृष्ण विहारी नूर को गजल का शेर छैन ?’ अपने होने का सुबूत और निशां छोड़ती है/रास्ता कोई नदी यूं हो कहां छोड़ती है। खुद भी खो जाती है मिट जाती है मर जाती है। जब कोई कौम कभी अपनी जुबां छोड़ती है।’
च’ भुला अनूप को काव्य संगै ‘बात हौरि काव्य संगै मा दस शानदार गढ़वळि गजल, अड़तीस कळग्यसरि कविता, पांच मयल्दु गीत अर इक्कावन शेरो शायरी मुक्तक कुल मिलैकि एक सौ चार रचणा छन। वो अपणि दुधबोलि का प्रचार प्रसार मा अग्रणी भूमिका निभाणा खुणै तैयार छ।
गढ़वळि मा गजल लिखणु कठिन त नी छ पर इतगा सौंगु अर सरल बि नी छ।
जख तक गढ़वाली गजल को सवाल चा अभितलक त ग्वाया हि लगाणि चा पर
जन जन नै वाळि का ज्वान कवि शायर को रुझान गढ़वाली गजल की तर्फा हुणु चा उम्मीद चा आणा वळा बणत मा गढ़वाली गजल अपणो थान जरूर पैलि। गढ़वाली गजल अपणि सबद सम्पदा अर पड़दरा सुणदरा लिख्वारू की मदद रुझान से अपणा मानक अर गजल का निर्धारित मीटर पर तपे तुपैकि आली। आज हम इन उम्मीद कै सकदवां। आखीर मा अनूप रावतन भी धन्यवाद का दगड़ अपणि सारसगोर्या बात रखि बोलि कि यऽ समीक्षा दूर्ते सै दिसा-निर्देस दे ग्याई, जो वृंका अग्नै
का लेखन तै हौरि सशक्त बणालि । तिसरा सत्र मा डॉ० पृथ्वी सिंह केदारखंडी की द्वी पोथियों ‘वेदना हुई मुखर’ अर ‘प्राकृतिक चिकित्सा के आयाम’ कु विमोचन हे। डॉ० मनोज कामदेव जोन केदारखंडीन जी हैं दमदार दोहों का जरिया साधुवाद देश।
डॉ० हरेंद्र सिंह असवाल जीन ‘वेदना हुई मुखर’ पढ्दां बोलि कि वृर्ते आचार्य हजारी प्रसाद जी की ‘अशोक के फूल’ निबन्ध की कुछेक लैन अनायास समलौण्या हेगिं।
