रंत रैबार ब्यौरो…..
चौतर्फी खरड़ा अर ढालदार पुंगड़ा-डोखरों मा चमकदा गारा-ढुंगा। कखि पुंगड़ों बीच खड़ी लैंटाना कि झाड़। पुंगड़ों का तिर्खाली खड़ा खड़ाखड़ा डाला अर दूंमा बसदा कांणा गरूड़, गौं अपणि जगा मौजूद छन पर गौं का जादातर कूड़ा खण्द्वार होयांन। बूंका गठ्यार जख गोरा भैंसो कि गाजी से भर्ती रैंदें छा। आज कूड़ा-कचरा का घर बण्यांन, वो जै भितर रैंदा छन वूतें हैंकों भितरै खबर नी छ कि वख गुरौ-छिपाड़ा छन य फिर स्याल-कुरस्यलों को बासु बण्यूं छ। बूड़-बुड्य एक दुसरों मुख देखी निढाल-निराशा अर मजबूरी प्रदर्शित कना छन। यो दृश्य सिर्फ कलमा का उमाल कि प्रतिक्रिया नी छ बल्कि एक कड़ी सच्चै छ। यिनि सच्चै कि जैको शैद कि क्वी तोड़े हो। अगर कखि छ वि व वेतें जमीन मा उतरणो क्वी तयार नी छ। बल्कि कैकि बि हिकमत नी छ जो कि यिना उयार कैकि निर्जन, भुत्या अर बांजा ग्रामीण अंचलों मा जिदंगी को सूत्रपात कै सको। हर्बि-हर्षि यीं मानसिकता तैं खाद-पाणि मिलि। आज वो एक वटवृक्ष की अन्वार ल्हे चुकि ग्ये। अब जब य समस्या लाइलाज हवे ग्ये त सुद्धि मुद्धि आपरेशन को नाटक कन से क्वी फैदा थौड़ाई छ। मुश्किल यिलै बोलेणू छ कि पूरी व्यवस्था मा आमूल चूल परिवर्तन कन पड़लो। यांखुण न सिर्फ सरकार बल्कि आर्थिक रूप से सम्पन्न अर पहाड़ का प्रति संवेदनशील लोगु तैं ईमानदारी से अगनै औण पड़लो।
पहाड़ मा खेती किसाणी कि वी सैकड़ों साल पुराणि प्रथा आज बि बदस्तूर चल्छ औणी छ। वी हौल-बलद, निसुड़ा-बंसुला, जोल-दंदाला अर पुंगड़ा बाणों पुराणों ढर्रा, वो न सिर्फ प्रासंगिक रैग्ये अर न वेक प्रयोग से खेती-किसाणी की कायापलट वे सकदी। बोले जांद बल कि आवश्यकता अविष्कार तें पैदा कर्दरि छ। पर आधुनिक युग मा यांको उलट सिद्धांत चलन मा छ। वो यो अविष्कार से नयि जर्वतों को जन्म होंद। जनकि मोबाइल फोन सिस्टम। यानि मोबाइलन अपणि लोकप्रियता बढ़ौणो कथगै जर्वत पैदा कर यालिन।
एक आम मानसिकता छ कि पलायान का कारण अनदेखी पलायन को दंश सहन कनू छ। खासतौर पर कृषि का चौपटीकरण यांको मुख्य कारण छ। प्रगट रूप मा त यी मैसूस होंद पर अगर यांका मूल कारण कि जड़ ख्वचजे जाव त पता चललो कि वखै पारम्परिक अर थकाऊ कृषि प्रणाली का कारण वख बटी रोजी रोटी कि तलाश मा लोगुन दिसावर कि तर्फ जाणु उचित समझि। अगर व्यवहारिक रूप से दूयखे जाव त वख हौल- बलदु वलि पुराणि खेती कि पलायन का वास्ता दोषी छ। विचारकों कि सोच कृषि का चौपटीकरण का पिछनै पलायान मुख्य कारण छ पर अगर वे पुरणा सिस्टम कि जगा मा 21वीं सदी का नया अर मशीनी सिस्टम तैं लोगु करे जाव त वख कृषि कि अन्वार बदले जै सकद। आज जबकि सब कुछ को मशीनीकरण वे चुकि ग्ये त पहाड़ ये मामला मा पिछनै किलै छ होल-बल्लू जगा प्लोअर अर कल्टीवेटर जनि मशीन का चलन वख किलै नि करे जाणू छ। यो सिस्टम उबाऊ, थकाऊ अर अवैज्ञानिक परम्परा कि जगा ल्हे सकदं। ये बात हमरा जिम्मेदार लोग तैं समझण चयेणी छ।
आज जब कि प्रवासी लोग पहाड़ मा सैर-सपाटा य फिर ब्यो पुजै खुण घर जांदन त वो प्लेंस बटी क्वी यिनि मशीन ल्हकि नि गया जांसे पहाड़ कि जिंदगी तैं राहत मिल सको। प्रवासी लोग नित नया फैशन का कपड़ा पैरी जै सकदन। अपण आराम का तमाम संसाधन अर वखा लोगु तैं प्रभावित कना चोंचला ल्हेकि त जांदा छन पर वो कबि गौं मा ब्यो-कारिज खुण एक 30 लीटर को प्रेशर कुकर ल्हेकि नि गया। यानि कम मेहनत से जादा काम सम्पन्न हवे जावन यिना संसाध नों को प्रचलन गौंमा करे जाव त वखै कठिन अर पहाड़ जनि जिंदगी आसान हवे सकद। जीवन सौंगु अर सुरक्षित बणौणा कथगै साधन प्रचलन मा ए सकदन। जनकि सैकड़ों साल बटी गौं मा उच्चा डालों बटी गोरू खुण चारा पत्ती काटी ल्हये जांदन। पर गौंका प्रधान य फिर प्रवासी लोगुन वख ब्लॉक कि तर्फ बटी दिये जाण वली बारामसी घास कि कास्त कनै सला नि दिनी। गोरू मा वुन्नि घास धोल दिये जांद जबकि अगर गौं मा द्वी-चार ग्रास कटर लगै जावन त जख चारा-पत्ती को सदपुयोग करे जै सकद। वखि गेर भैंसा चाव से चारू खै सकदन।
यिनि बात नी छ कि पहाड़ मा जीवन पद्धति नि बदली। वख सड़कि ऐ ग्येनि। लोगु का पास अपण वाहन छन। मनरेगा आदि से उपार्जित आय तूं खुणी जीवन जीणौ आधार बण्यूं छ। कंट्रोल कि दुकान्यूं बटी छक्कै ग्यों-चौंल मिल जांदन। पैरणो पुरणा कपड़ा नि होंदा बल्कि नया अर पोलिएस्टर को चलन चल चुकि ग्ये। हर घर मा मोबाइल फोन छन। पर कृषि पर कैको बि ध्यान नि गयु। यानि मैदानों कि तरां पहाड़ मा तमाम कृषि यंत्रों को चलन शुरू करे जाव त वख जिंदगी सौंगि हवे सकद। अजकाल छवटा-छवटा ट्रैक्टर वखा पुंगड़ों का वास्ता उपयोगी साबित ह्ववे सकदन। यि मशीन जख गहरै तक पुंगड़ों तौ बा सकदन बल्कि अनावश्यक ढुंगा-गारों तैं एक तर्फ कैकि माटा तैं खेती जुगा बणै दिंदन। यांमा मानव शक्ति न का बरोबर लगलि त लोगु को दिलचस्पी यीं तर्फ वेलि। कृषि का यंत्रीकरण से न त हौल-बल्दवी परेशानी अर न हल्यों का नखरा जर्वत कुछ नयु कनै की !
