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रंत रैबार ब्यूरो
देहरादून। पहाड़ मा नौळा-धारा तकरीबन सुखणा कगार पर छन। कुछ त निरपट सुख गेनि। कुछ मा पाणि घटद जाणू छ अर कुछ अपण जीवन का आखिरी स्टेज से गुजरणा छन। वैज्ञानिकों को बोनु छ बल कि यूं कि रक्षा लोक विज्ञान का प्रसार से करे जै सकेंद। यो कि यां खुण सरकारी स्तर से स्प्रिंग शेड ऑथारिटी कि स्थापना करे जाण चयेणी छ।
वस्तुस्थिति यखे जावत पता चललो कि पहाड़ी क्षेत्रु का धारा-नौळों का सुखणों कारण खासतौर पर वख परती होंदी कृषि भूमि छ। हर्बि-हर्बि खत्म होंदी कृषि संस्कृति को खामियाजा यू धारा नौळों तैं सुखी चुकौण पड़नू छ। वास्तव मा व्यखे जाव त पहाड़ कि जादातर कृषि भूमि बंजर होणें स्थिति मा पौंछ ग्ये। जौं पुंगड़ों मा कबि वारा बान्यो नाज पैदा होंदो छौ वख आज कंकर-पत्थरों को राज छ। य फिर खैड़-कटग्यार पैदा
होणू छ। यिनी वनस्पति पैदा होणी छ कि जो कि धरती कि नमी तें पूरी तरां सूख वीतें बेकार कन मा खास भूमिका अदा कनी छन। जबकि दलहन-तिलहन जनि खेती वळि वनस्पति जमीन तैं उर्वरा बणैकि बरखौ पाणि संचित कैरी रखदी है। यांसे चूंकि पाणिको शोषण अर संरक्षण होंदो छौं ये वास्ता धरती मा नमी बणी रैंदि छै पर आज कृषि भूमि कि ऊपरी उर्वरा परत बंजर ह्वेगे। पाणि पुंगड़ों कि उपरली परत मा पड़ी सीधा ढाल कि तर्फ पैट जांद। मूसलाधार बरखा जब होंद त पुंगड़ों बटी पाणि का धारा चल्न बैठ जांदन। जबकि पैलि जब हर है मैना साल भर मा यूं पुंगड़ों मा हळ चल्दों छौं। बरसात को पाणि जमीन कि ऊपरी पोली परत मा समै कि धरती हैं जल संचयन कि ताकत देंदो छौं। नतीजतन पहाड़ का
धारा नौळा कुछ दिन मटमैलो पाणि देंदा छ। अर वेका बाद छाळो पाणि सालभर मनखि तें उपलब्ध करौंदा छा। कुछ धारा नौळा यिना बि छन कि जो सैकड़ों साल बेटी निरंतर मनखि तें मिठु पाणि देंद जणा छन पर कुछ कि हालत खस्ता छ। नौळों को त चलण हि खत्म होंद जाणू छ।विशेषज्ञों को मनणु छ कि जै ढंग से ढांचागत विकास तेजी से बढ़नू छ अर जनसंख्या बढ़द जाणी छ वे अनुपात मा प्राकृति संसाधनों तें संरक्षण प्रदान कनै दिशा मा काम नि होणू छ। य बात से छ कि विकास अर जनसंख्या वृद्धि का अनुपात मा प्राकृतिक जल संसाधनों तैं संरक्षण नि मिल्नू छ। त यां खुण बि सरकारी व्यवस्थ जिम्मेदार मन्ये जै सकद। यानि जथगा प्रतिशत मनख्यों की प्रकृति पर निर्भरता रैलि वुथगै अनुपात मा वृंको संरक्षण होलो। हर क्वी वृतें ज्यूंदा रखणो प्रयासरत रालो। पर जब मनख्यों कि जल संबंधी जर्वत न्यून ह्वे जाव य फिर कामचलाऊ व्यवस्था अमल मा लाये जाणि शुरू ह्वे जाव त
प्राकृतिक संसाधन हाशिया मा चल जांद यानि जब निर्भरता हि कम हे जैलि ता वृंका होण नि होणो क्वी अर्थ नि रखदो। ठीक यीं तरां से हि पहाड़ का लोग जय तक वखा धारा नौळों पर आधारित व्यवस्थ पर निर्भर छा तब तक तूंमा खूब पाणि रँदो छौ। धरती हर बार जल से रीचाज होंदी है अर प्रकृति-मानव को सामंजस्य बण्यूं रैंदो छौं पर अब सब कुछ सतही ग्ये। सरि निर्भरता आटिफिशियर ह्वे ग्ये कखि दूर बटी नळखों मा पाणि औंद राशन कि दुकानों मा ग्यू चौळ मित जांदन। फिर खेती कनै बि जर्वत नि रैंक अर न हि वखा नौळा-धारा-खाळों क सुखण से कैौं फर्क पड़दो।
जरूरत छ धारा-नौळों तें बचौ वास्ता कारागर कदम उठाणै कि। अ तक जु बि शोध हेनि वृतें जमीन उतरे जाण चयेणू छ। यांका अलाब जल-जंगल-जमीन संरक्षण की अवधारण पर विशेष ध्यान देणे क जरूरत छ।
