रंत रैबार ब्यौरो…..
उत्तराखण्ड का पहाड़ी क्षेत्रों मा बणाग वखै नियति बण ग्ये। हर साल सैकड़ों हेक्टेयर बण फुकेकि राख हवे जांदन। पर्यावरण कि दृष्टि से संवेदनशील करीब 70 प्रतिशत वन क्षेत्र वळा ये प्रदेश मा बणों कि आग. हर्बि-हर्बि विस्तार ल्हेंद जाणी छ। अब वो जंगळों से लगीं बसावटों त पौछण बैठ ग्ये, फिर चै वो लैंसडाउन क्षेत्र हो चै चमोली क्षेत्र का गौं तसवीर हर जगा एकजनि नजर औणी छ। समस्या सबि जगा यकनसी छ। य बात नी छ कि जंगळों से लग्यां गौंका लोग चुप बैठ्यां छन। वो बि भरसक कोशिश कना छन कि जंगळों तैं आग का सुपुर्द होण से बचै जाव। फिर बि जंगळ जख तख सुलगाणा छन। वनकर्मी वि सीमित संसाधनों का चल्द अग्यां रोकणो गौं वळों से मदद ल्हेणा छन बावजूद मौसम का हिसाब से निर्मित विभागीय रणनीति मा जगा-जगा झोळ नजर औणा छन। दुन्य कख, बटी कख पौंछ ग्ये पर हमरो वन विभाग अपण वन रक्षकों तैं झांपों से आग नियंत्रित कनौ प्रशिक्षण देण तक सीमित छ। झांपा यानि डाळों से पत्तीदार शाखा काटी वृतै झाडु का रूप मा इस्तमाल कनौ जुगाड़। यानि आज कि विभाग 19वीं सदी का तौरतरीकों से बणांग पर नियंत्रण कना डयार कनू छ। हालांकि यो बि कारगर तरीका छ पर यांसे अगनै बि त क्वी तकनीकी ईजाद करे जै सकद आग मुंजौणौ। य बात नी छ कि विभाग मा तकनीकी यंत्रों का अभाव हो पर वृंको इस्तमाल पहाड़ों मा बि सुविधाजनक रूप से करे जै सको वृंका पास यिनी क्वी तकनीकी नी छ।
हालात यि छन कि जंगळ कि नयि पौध हो चै बड़ा डाळा हर्बि-हर्बि आग कि भेंट चढ़ना छन। उत्तराखण्ड का जंगळों तैं यीं दयनीय स्थिति से बचौणो सरकार तैं कारगर उयार कन चयेणा छन। जाणकार बतौणा छन कि बण क्षेत्रों मा चूंकि जमीन सूखी रैंद यानि नमी कि कमी का कारण अग्यां तेजी से होंद। वृंको सुझौ छ बल कि जंगळों मा जमीन कि नमी बणी राव यांक वास्ता विशेष प्रयास करे जाण चयेणा छन। यो बि कि चूंकि पिछला छै मैना बटी अंक्वे बरखा नि ह्वे ये वास्ता जंगळों कि नयी स्थिति अपेक्षाकृत बणाग का वास्ता जादा जिम्मेदार छा। ये वास्ता आकाशीय पाणि कि बूंदों का संरक्षण पर विशेष फोकस करे जाण चयेणू छ।
बणाग लगणी रैंद अर विभागीय कर्मी वी पुराणा तरीकों तैं इस्तेमाल कर्मी वी पुराणा तरीका तैं इस्तमाल म ल्हौणा छन। विभाग को तर्क छ कि वृंमा संसाधनु कि कमी अर स्टाफ को अभाव छ। यी वजै छ कि आज बि अंग्रेजी शासन का टैमा तरीकों से आग पर काबु कन्नै कोशिश करे जांद। आज 21वीं सदी मा बि ये विभाग मा आधुनिक अग्निशमन साधनों को घोर अकाळ छ। बणाग रोकणों यानि जंगळ कि हिपाजत खुण अभियान चलौणै बात बोल्ये जाणी छै पर वो सिर्फ बयानबाजी तक हि सीमित छ। जन तें जंगळ से ज्वड्नों विभाग आंदोलन चणौणे बात त बोलदो छ पर हकीकत मा कुछ बि नि होंदो। वास्तविकता या छ कि एक लंबा अरसा से पहाड़ कि जनता जंगळों से जुड्यां वृंका हक हकूक कि आवाज उठौणी छ पर क्वी सुणदर्श नी छ। जंगळ बचौणे गौं मा वन पंचैत्यों को गठन जरूर हवे पर चूंकि भूमिका को कखि बि इस्तमाल नि करे जांदो वास्ता मा जनता तैं जंगळ से विमुख कनौ दोषी बि सरकारी कैदा कानून हि छन। पैलि क्षेत्रीय जनता जंगळों से सीधा जुड़ी छै त वो जंगळ बचौणो सबसे पैलि तयार मिल्दी छै सरकारी कर्मचारी औण से पैलि हि लोग आग पर काबु कर देंदी छ। शैद यी वजै छ कि पहाड़ मा लोगु न निजी प्रयासों से जंगळ विकसित करिन वो आज बि यासि भावनात्मक जुड़ाव रखदन।
बोनो मतलब यो छ कि अगर बणाग कि घटनों पर नियंत्रण कनु हो त क्षेत्रीय जनता का वन हक हकूक बहाल कन पडला। निथर सरकारी अमला का सारा रैकि बणाग कि घटना रोके नि सकेदी विभागीय शीर्ष पर बैठ्यां जिम्मेदारी लोगु तैं चयेंद कि वो एसी दफ्तरू बटी भैर निकळी जंगळु कि वास्तविकता समझन। आखिर जल-जंगल पहाड कि सम्पदा छ। यूतै बेकार हि नि गंवये जे सकेदों।
