देहरादून। उत्तराखण्ड मा रूड्यों का मौसम कि दस्तक शुरू हवे ग्ये। लोगुन गर्मी शुरू होंदै पंखों तौळ रैण शुरू कर यालि। ये हि क्रम मा यख पेयजल संकट कि संभावनों पर बि विचार मंथन शुरू कनु जरूरी छ।
राज्य मा हर साल रूड्यों का चल्द पेयजल संकट कि समस्या आम बात छ। अप्रैल मा गर्मी कि तेजी देखी लगणू छ कि ये साल मई-जून का मैना गर्मी का मामला मा चरम स्थिति वळा रैणे संभावना जतै जाणी छ। खासतौर पर शहरी क्षेत्रों मा पीणो पाणि कम हि उपलब्धता ह्ववे सकद। किलै कि यीं समस्या का मूल मा जयां बिना शहरी लोग पाणि को बेदर्दी से इस्तमाल कर्दन। वो यीं बात से अजाण छन कि पाण्यू स्त्रोत कब तक अर कथगा मात्रा मा पेयजल उपलब्ध करै सकदैन।
उत्तराखण्ड गंगा, यमुना, टोंस, अलकनंदा, नयार, घाघरा आदि सदानीरा नयूँ को उद्गम क्षेत्र छ। ये हिसाब से यख पेयजल संकट होण हि नि चयेणू छौ पर हकीकत कुछ हौर हि छ। ये संबंध मा उचित नियोजन को अभाव होण से शहरी क्षेत्रों मा पेयजल संकट हर साल पैदा हवे जांद। कारणों कि तह मा जाण से पता चल्द कि पेयजल संकट की पिछनै प्राकृतिक स्त्रोतों को सुखणु छ। अध्ययन बतौंद कि प्रदेश मा डेढ सौ से जादा जलस्रोत सूख चुकि ग्येनि। यो बि कि 500 से जादा स्त्रोतों मा पाणि का लेबल उंदु जाण से पेयजल संकट बढ़द जाणू छ। प्रदेश कि अधिकांश पेयजल योजनों से 50 से 90 फीसद नागरिकों का वास्ता हि पीणो पाणि उपलब्ध हवे सकद। द्यखे जाव त पेयजल संकट का पिछनै जलस्त्रोतों को रखरखाव का प्रति उदासीनता कि भावना छ। यि जल स्त्रोत अंक्वे देखभाळ का अभाव मा सुखद जाणा छन। शहरी क्षेत्रं मा ते य स्थिति आम छ पर खासतौर पर पहाड़ी गौं का लोग कि वखा धारा-पंदेरों का प्रति उदासीन रवैया रखदेन। कारण कि वख बि जादा सुविधाभोगी लोगु मा तमाम जल स्त्रोतों से नळ्कों का माध्यम से घरों का नजीक पाणि दिये जाणै सोच विकसित हवे ग्ये। नतीजा यो कि मूल जलस्त्रोत उपेक्षित हवे ग्येनि। ये वास्ता वख बि पाणि कि उपलब्धता कम होंद जाणी छ।
एक जमानु छौ कि गौं का धारा-पंदेरों कि पूजा होंदी छै। लोग ताजु अर स्वच्छ पेयजल यूं स्त्रोतों से ल्हादा छा! पर अब चूंकि घरों का नजीक हि पाणि ऐ ग्ये त घारा- पंदेरों का बजाय नळ्खों कि टोट्यूं कि पूजा करे जांद। वुन बि राज्य का जादातर भू भाग बरखा पाणि पर आश्रित छ। राज्य मा हर साल औसतन 1520 मिलीमीटर बरखा होंद। ये मद्दे 1229 मिमी मानसूनी मौसम कि देन छ। अगर ये पाणि तैं संरक्षित कना मा मामला मा सरकार युद्ध स्तर पर प्रयास करो त जल स्त्रोतों का पुनर्जीवन मा काफी मदद मिल सकद। य बात नी छ कि विभागीय स्तर पर य क्षेत्र मा प्रयास नि करे जांदा पर प्रयासों तैं ईमानदारी से धरातल पर उतरणु अलग स्थिति छ। यांक वास्ता आम ग्रामीणों अर जलस्त्रोतों पर निर्भर लोगु को जागरूक होणु जादा जरूरी छ। सिर्फ पहाड़ों मा चाल-खाळ-नौळों कि परम्परा विकसित करे जाव त धरती रिचार्ज होलि अर जलस्त्रोतों तैं पुनर्जीवन मिल जालो परं असल स्थिति या छ कि आज को मनखि चै शहरी हो चै ग्रामीण सब थोड़ा सि प्रयास कैरी जादा से जादा हासिल कनै सोच ग्रसित छन ये वास्ता कामचलाऊ स्थिति पैदा कैरी सब बिसरि जांदन।
रै बात मैदानी क्षेत्रों मा पेयजल संकट कि त यख हर घर अर काम्पलेक्सों मा पम्पसेट लगै दिये ग्येनि ये वास्ता भूजल स्तर कम से कमतर होंद जाणू छ। बसगाळ का टैम जख यूं पम्पसेटों मा पाण्यू प्रेशर तेज होंद वखि ह्यूंद अर रूड्यूं मा प्रेशर कम होण से पेयजल संकट बढ़ जांद। यांक अलावा ये भूजल को इस्तमाल लोग मोटर गाड़ी धोणो अर बाग-बगीचों कि सिंचै खुण करदन। नतीजा यो कि जर्वतमंदों तैं पीणो पाणि उपलब्ध नि हवे सकदो। यानि भूजल को अवैज्ञानिक अर निर्मम दोहन यी स्थिति तैं पैदा कन मा अहम भूमिका अदा कर्द। जख तक देहरादून शहर मा पेयजल संकट को सवाल छ त यखा वास्ता यमुना य टोंस नदी बटी पेयजल लाइन बिछौणै बात अकसर बोले जांद पर यां पर सिर्फ छ्वी-बात हि करे जाणक सार्थक प्रयास कम हि करे जांदन। अगर वित्तीय समस्या हो त यो काम चुनौ का टैम सरकारों का माध्यम से औण वळा धन से करे जै सकद। खर्च यिथगा जादा नी छ पर ये मामला मा गंभीर प्रयास नि करे जांदा सस्ती राजनीति अर त्वरित फैदा देण वळा मुद्दों पर जादा फोकस करे जांद ये वास्ता पेयजल जनि गंभीर समस्या हाशिया मा ऐ जांद। यांक वास्ता गंभीर, ईमानदार अर समवेत प्रयास जरूरी छ।
