व्यंग….
अब-आर्टिफिशल इंटेलिजेंस ऐगे घर-घरम। हमरि-तुमरि सोच-समझ भरमैगे घर-घरम ।।
इनम कैकि बतौं फरि कनम विश्वास करण, कनम लिख-ब्वाल-अप्णु क्य रैगे घर-घरम ।।
को बोलद-को गिचु खोलद-को गांद-बजांद, जै-कै टैलेंट दिखांणै-होड़ सि लैगे घर-घरम ।।
आज- एआई न-हमरि सोच-समझ खयाल, अब घंटौं काम – सर ‘मिंटौंम ह्वेगे घर-घरम ।।
फेसबुक-यूट्यूब-इंस्टाग्राम – सबजगा छैगीं, बच्चा-बड़ा-बुड्यों- निकजु कैगे घर-घरम ।।
बोलदीं – गीत-गज़ल बड़ें दींद-अफी गै दींद, अब त सैत्यकार-कलकार बणेंगे घर-घरम ।।
‘दिन’ जमनु ग्रामोफोन से मिट्टी तक पौंछ, इनाम- क्वी दढ़ रैगे- क्वी छैगे घर-घर।।
दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
