(भगवती जुयाल गढदेशी)
मन दयालू मयालू कृपालू मिजाज कू दिलै गेड्डु खोलणू भौंण सुणाण कू
‘लिखदू जथा दुन्यै सच्चै बथाण कू दिन रातै भामी बोली तैं ठद्याण कू
मनखी मनख्यात लिखे जावू भावू मा भोगी ज्वा बीती बीतली अगनै दुनि मा
लंत लोभ माया फेर मनख्या ओर पोर पशु बिचरू ढणकदु हेरी पेटा कू सोग
मनखी जोन दुन्यम भली मने जांदी प्रकृति काया मा जै की सरी समाई रेंदी
हाड मांसै देह जीव तैं जोन्यूं की मिली वाण्यू लवास केवल मनखी सणी मिली
मनै व्यथा मनखी सूणी गुणी बचै सकदू पौन पंछी पशु च्वीं चै या रामी ही सकदू
कर्म धर्म संस्कार सभी त छिन हाथ मा बल बुद्धी विवेक सभी मनख्या हाथ मा
करमु की करतुत मनखी तैं भटकौणी रेंद अबोला पशु बिचारू भागौ पिडै पिडै जींदू
ना बोली सकदू न सोची पेटौ चारू चयेंदू मनखि खलचट्या लोभी खालि स्वार्थ देखदू
मनखि अर पशु मा फर्क रंग रूप गात कू कर्म इंद्री बरोबर फर्क सिरफ लम्बी पूछ कू
पशु बिना सोच्यां तोल्यां कै जांदू रांझी बांझी मनखी होस हवास ख्वे की बणि जांद झांजी
बणयू छौ मनखि दुन्यां मा सभू ख्याल करलू प्रकृत्यू सुख भोगलू जीव जनत्वी रख्वली करलू
पशु धन भौ बृधि धन धान्य कू दुन्यम आधार च मनखी बिनास की ओर बढणू दुन्या लाचार च ।।
