बल भैजी…..
(दिनेश ध्यानी)
सन् 1996 अप्रैल का मैना मिल टीरि अपणा दगड्या ब्यौ म अंजनीसैंण जाणु छौ। टिहरी म बस कि जग्वाल कनौं छौ। मेरी आदत छ कि कखि बि जौं मौका मिल्दा ही लोगों से बात करदु।
मिल कुछ दुकानदारों से बात कैरि कि यख फलणा पर्यावरणविद् कु धरना का चलणों ? मिल वों तैं मिलणु छ।
एक दुकानदार ल बोलि कि वो व झुग्गी दिखणा सड़का किनरा वखी छन श्रीमान।
हँका दुकानदार ल गुस्सा म बोलि कि तखी होलु गंगाळ।
द्वियों से भौत सारि बात कैरि। वोंन बोलि कि वै तैं पुछ्यां कि वैन अपणी जमीनौ मुआवजा कतगा दौं लीयलि ?
दुसरु यनु बि पूछा कि त्वैन अपणी जन्दिगी म एक डाळु बि रोपि हो ता बतौ कख रोपी ?
वॉल बोलि कि गौरा देवी बिचरि सीधी साधी गौं की भलि महिला छै। वीं तैं अपणी धरती, बण, जंगळ से पिरेम छौ। वीं म छल, कपट नि छौ। इलै व बिचरि चिपको आन्दोलन तैं भुनै नि साकि।
सि द्वी दुकानदार वखा लोकल मनखि छ्या ता बोलि सकदन कि रीस का कारण यनु बुलणा हो। पण फिर बि कुछ बातों से लगदा कि कुछ झोळ रै हो !
टीरी की वीं घाटि म जन्निजन्नि बस अगनै बढ ता देखि कि हर सेरा, पुंगड़ों का किनरा छुटा – छुटा निनरा सि तीन बाइ चार का कमरा सि बणयां छाया। पुछण म पता चलि कि अधिकांश लोगों ला बि अपणा मकान दिखंया छन अर वोंका बदला मुआवजा लीणा छन। ता सैद वों ला बि ल्हे हो। सोचि हो पैसा मिलणों हो ता….. आणि द्या।
बल भैजी बाकी दुकानदारों बात से मन म विचार ऐकि कि सौब जणदन कि को कतगा गैरु पाणि म छ। कु क्या करणों छ!!
इलै खुल्दन बल-
हाथी का दांत खाणा हौरि अर दिखाणा हौरि होंदन।
