पुस्तक समीक्षा…..
(रमेश हितैषी)
यो एक गढ़वाळि नाटक छ। जै मा कुल 25 किरदार छन। किताबो आवरण सुंदर अर आकर्षक छ। 144 पेजै यीं किताबी भाषा शैली सौंगि अर सुबोध छ।
बदलदा वक्त का दगड़ा लोग अपणा रीति-रिवाज, संस्कृति अर परंपराओं तैं छोड़ना छन। नयि पी हैं योंकि की जानकारि नी छ। यों परंपराओं तैं जाण्यां बिगर आज सभि निभोंणा छन। अब चिंता कि बात या छ कि औंण वाळि पीर्डा पर
येकु क्य असर पड़लु। आज हम लकीर का फकौर बणीक रैग्यैन। परंपराओं क मतलब जाण्यां बिगर हि जों तैं निभोंणा छन।
हितैषी जी हैं चिंता छ कि आँण वाळि पीई पर येकु असर क्य पड़लू। अब हम परंपराओं तैं बस निपटाणो काम कना छन । यांसे बढया छ कि हम तों परंपराओं तैं मणये हि किलै जो ? अगर मण्न त योंकु सहि मतलब जाणी समझी तैं माणा। खालि धूळ मा लट्ठा मारी क्य फैदा ? अजगाल परंपराओं दगड़ी छेड़छाड़ यानि फेरबदल भि भौत हूणी छ। भविष्य मा जब ओंण वळा बच्चा योंकु मतलब हम तैं पूछला अर तब हम बतै नि सकला त खुदी येकु उपहास के जालु। तब वु यों परंपराओं से विमुख हे जाला। लेखकन % मुकदान% दान% परंपरा कु उदारण भि दियों छ कि हम हिंदू मान्यता अनुसार मुकदान करदा छन पर, गुरुड़ पुराण त कुछ औरी बुनू छ।
परंपराओं कु क्की प्रमाण नी छ। वु यों परंपराओं तैं दंत कथाओं पर आधारित मणदन। लेकिन फेर भि यि धर्म-संस्कृति अर आस्था से जुड़ीं छन। यों परंपराओं कि आड़ मा पीडति पक्ष से मोक्ष दिलाणो मोह पैदा हे जांद।
अगनै रमेश हितैषी बुना छन कि जीते जी त हम अपणों कि परवाह कम करदन, पर म्वना बाद एकदम से हमारु मोह जागि जांद। तब इंसान सोचदू कि अब जु भि हो मेरा अपणों तैं मोक्ष मिलि जो। गरुड़ पुराण मा प्रेत आत्मा कि मुक्ति का वास्ता टेढ़ा-मेढ़ा नियम बतयां छन। पर हर इंसान बस यी चांदु कि कुछ भि हो, मेरा अपणों हैं
मोक्ष मिलि जो। लेखक बतोंणू छ कि हम यु सब समाज का डर से करदन अर कुछ दिखावा का वास्ता, त कुछ समृद्ध दिख्योंणों तैं। लाचार
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आदिम त यी सोचीक करदु कि लोग क्य बोलला ? वरना त कुछ दिन बाद वे इंसान तै भूलि हि जांदन। सबसे बडु सवाल हितैषी जीन उठाई कि आखिर मुकदान कु मतलब क्या छ ?
पर जब तक यि परंपरा ज्यूदि छन… लेखक बुनु छ कि उत्तराखंड मा न त गोवंश सुरक्षित छ अर न गोपालक बच्यां छन। त फेर गाँसे जुड़ीं रीति-रिवाज सुदि-सुदि व्यनो/निभाणो क्य मतलब छ? पूजा का बाद गोग्रास निकळये जांदु । गोरु दूर-दूर तक भि नि दिखेंदु। गंगा जल न हो त चलि जालू पर, गाँत यानी गौमूत्र छिड़कण जरूरि माण्ये जांद। किलैकि मान्यता छ कि गोरु मा तेंतीस कोटि द्यबता बास करदन। पर आज सवाल यो छ कि जब गोरु हि नि रैगी, त गाँत अर मोळ कख बटि ल्यों ? लेखक मुकदान यानि मोक्षदान कि विडंबना बताणू छ। इंसानक मरण से पैलि गोदान जरूरि मण्ये जांद। लोग दूरदराज बटि बाछ्यू/बछड्यू मोळ लेकी,
लेखक गढ़वळि संस्कृति अर परंपराओं कि सच्चैई हैं बड़ी बेबाकी से लिखणू छ। जु सच मा काबिले तारीफ छ। लेखकान जु सवाल उठन, वु हर समझदार उत्तराखंडि का मन मा होला। परंपराक नीं पर पाखंड कु उजागर करण अर नयि पीडितै असली मतलब समझोंण- वी त सच्चा लिख्वार कु धरम छ। ये नाटक का प्रकाशना वास्ता । लेखक तै हार्दिक शुभकामना छन, अर। आशा करदू कि य पोथी गलत परंपराओं अर पाखंड का प्रति उत्तराखंडी समाज हैं सहि बाटु दिखालि ।
