(जगमोहन सिंह रावत द्वारा)
दिल्ली। डॉ कुसुम भट्ट द्वारा निर्देशित ‘द्रोपदी को नारैण – मौर मौरयाण’ गढ़वाली कुमाऊनी जौनसारी अकादमी का तत्वाधान मा कुसुम का हि मांगल गीतों से शुरु ह्वै। कुसुम का ये हि आयोजन का वास्ता पजलकार जगमोरा को भी आह्वाहन छौ कि बल एक से द्वी भल्ले, द्वी से तीन बल्ले बल्ले। त बल चल मेरा थौला, जख जौला वखी खौला, कुसुम भट्ट का मंडाण मा जौला, मुक्ति पाणु मुक्तिधारा का गंगाड़ मा जौंला। बल जगमोरा को देव आह्वाहन ह्वा, त कुसुम वाटिका मा पंचपरमेसुरौं मंडाण त लगण हि छौ। बल द्यब्ता छोटो अर छैळ बड़ो।
पंचेळी (पांच कन्या मा स्थापित) कुंती माता की छैळछौं (छत्रछाया) मा पंच पंडौ मंडाण मा लोग कम अर सरदार, गुप्ता अर द्यब्ता भंडि आणा छा। बल अतिथि देवो भव। सिख नेगी गुरु गोविंद सिंह अवा अवा। कुसुम का जागर लगिं, गुरु गोविंद सिंह भीम का औतार मा बोलण बैठि- *चिड़ियों से मैं बाज लडाऊ , गीदड़ों को मैं शेर बनाऊ। सवा लाख से एक लड़ाऊं, तभी गोबिंद सिंह नाम कहाऊं* ।। बल गोविंद गोपाल, अब तू ही समाळ।
बल जै दगड़ जगदीश, वै दगड़ क्यांकि बल रीस।
दिल्ली मा ठीक एक हि समै मा द्वि-तीन बड़ा आयोजन का बावजूद, कुसुम बल्लेबाज की बल्ले-बल्ले ह्वै हि छ। भै-बंदौं, इदगा भीड़ या ता सचिन तेंदुलकर का मैच मा हि दिखणौ मिल्द या फिर कुसुम भट्ट का मंचन मा हि दिखणो मिलि। दिल्ली मुक्ताधारा को सभागार यन खच्चा खच्च भ्वर्यूं छौ, जन कि मुफत मा मुक्ति की रेवड़ियां बंटेणि ह्वा। उनै मंच बिटि कुसुम का पंडो जागर गीत बोलों की शानदार बल्लेबाजी जारी छै, इनै सभागार मा दर्शकों का चौका छक्का लगणा छाया। सभागार मा तिल धन्नै जगा भि नि छै। हालांकि तिल को ताड़ अर राई को पाड़ नि है, ह्वै त बस कुसुम की कलै दाड़ (दहाड़) अर रघुराई को पाड़ (पहाड़)। सुद्दी नि बोलदन- *उत्तराखंडै नारी, सब्यूं पर बल भारी*।
कुसुम को हरि को सुमिरण छाई, त खूब मंडाण लगि, खूब बधाण जगि, खूब गंगाड़ जगि, खूब सलाण जगि। तब द्यब्ता त द्यब्ता, घोड़ै काठी भी जगी, जगमोरा राठी भी जगी। बल जख एक राठी, वख बल सौ रीठौं बांठी।
कुसुम को कला पक्ष, गायकी पक्ष, भाषा संस्कृति साहित्य पक्ष हि नि, वूंको व्यक्तित्व पक्ष भी भौत सशक्त छ। वो अपणा आप मा कला संवर्धन का क्षेत्र मा एक बड़ा संस्थान छन। वो विलुप्त होंदी लोक कला का संवर्धन का वास्ता अपणा पहाड़ अर देश की संस्कृति भाषा साहित्य का बीच रामसेतु बनाणा छन। जगमोरा परयास वूंका वास्ता सदानी एक गिलघ्वीड़ (कंगारू) को जन रालो। किलैकि घ्वीड़ तैं अपणु चांठु प्यारो, अर गिलहरी तैं हरि बांठु प्यारो।
कै भी आयोजन की सफलता, आयोजन परिपूर्ण होणा बाद दिख्ये जांद। कदगै आयोजनौ मा बल हम मेहमान किसके, खाये पीये और खिसके। मंच का बाद महफ़िल बल। यख पांच मिनट तक पंचपरमेसुरों की ताली, सैलिब्रिटी का दगड़ फोटोसूट, सशक्त हस्ताक्षर का हस्ताक्षर लेणै होड़, बताणु खुणि काफी छै कि आयोजन कन माफक रै। पजलकार जगमोरा अर पजल परिवार तैं सैलिब्रिटी का साथ फोटोसूट कन्नौ खुणि जद्दोजहद कन्न पड़ि। जगमोरान जांद-जांद अपणि वक्याबाणी बांचि गे- *सुश्री कुसुम तुम जल्दी पद्मश्री से सम्मानित ह्वेला*। संज्ञान देंदु कि डॉ कुसुम भट्ट एक सिद्धहस्त पजल पाठक होणा नाता कुसुम जगमोरा पजल पारखी सम्मान से भी सम्मानित छन।
बल कुंडळी क्या दिखणै, मनु पंवारै मुंडळी हि देखि ल्यादि। मनु पंवार को सारगर्भित संदर्भित आलेख अपणा आप मा हरेका मनै बात बोलि गे। मनु पंवारै मनै पावर, ह्वे सौ टनै बराबर।
कुसुम भट्ट तुम सुखी संत रयां, जुगराज रयां। तुमरा ज्यू मा भाषै बडूली, गला मा संस्कृति घंडूली, मुंड मा साहित्यै गडोली, मन मा पंडौ मंडाण अर खुट्टों मा गरूड़ी पराज रयां।
