(भीष्म कुकरेती )
हमर अडगैं (क्षेत्र ) मां बनि बनि ब्यौओं की चर्चा हूणी रैंद जो कुछ अपर विषय अनुसार बिलक्छणी घटना छे। जनकि बरात जंगळ पुटुक हरच गे , पुरण प्रतिशोध म बरात्यूं की जुतों से पिटाई , ब्योली क गर्भवती हूण पर बरात वापसी, ब्यौ का दिन सुबेर ब्योली क भजण ,ब्योला नौकरी से दिन बार कुण घोर नि पौंछ तो बोला क भाई दगड़ ब्यौ हूण आदि आदि। एक ब्यौ इन बि ह्वे कि क्या बुले जाय।
बरात जोश खरोश म ब्योली क इख पौंछ छे। उ समय छौ जब हुक्का सजला दगड़ जळदि अंगेठी बि बरातौ दगड़ चलदी छे। रात भर ब्योली वळों ओर से मंडाणो प्रबंध कर्युं छौ। तो जवान अर नचाड़ बराती नचण म व्यस्त रैन। तो ब्योली वळों पर बराती कख स्याला क समस्या बि नि रै। ब्रिटिश राज म तब चा को नयी नई संस्कृति शुरू ह्वे गे छौ। ब्योली क बूबा जी मालदारों (लकड़ी ठकेदार ) दगड़ काम करदा छा तो बरात्यूं कुण उठद बैठद चा को प्रबंध छौ। भौत सा बरात्यूं न पैल दैं चा चाख। कति तो ब्योली क बुबा जीम पौंछ गेन चा अर चिन्नी क आकांक्षा म।
गायदान म बि ब्योली क बुबा जीन खूब दान दे। पीतल का भांड देखि ब्यौला का स्वार भार जळ गेन कि हमर नौना क ब्यौ म तो इन दूण -दैज नि मील।
सुबेर नास्ता म बि रात क ना अपितु ताज़ी पूरी अर हलवा बरात्यूं तैं मील। दुफरा भोजन म फौड़ म बि पकोड़ा , बूरा (मिठ चूरा ) , घी छक कैक दिए गे छा कि चार पांच बराती तो बूरा अपर घर बि लीगेन।
बराती एक हैंका दगड़ छ्वीं लगाणा छा कि ब्यौली क बुबा जी मातबर ही नि छन अपितु हृदय का बि दयालु अर दानी छन।
बरात पैटणो समय ह्वे। बरात्यूं तै एक अन पिठै ना अपितु चार अन पिठै लग अर भौत सा बरात्यूं को तो भौत सा वयवय क हेतु पैसा मिल गे। चार अन कम नि हूंद जब एक रुपया म बीस सेर चौंळ आंदो। द्वी तीन बरात्यूं तो चार पैल दैं हथ लगै।
बरात्यूं पर पिठै तो लग गे किंतु बरात नि पैट। दास लोगों दस दैं बरात पैटणो घै ले आल छौ। ब्योली बुबा जी अर ब्योला क बुबा जी मामा जी बल छनि ( गौशाला ) म क्वी बड़ी चर्चा बहस म व्यस्त छन बल। बुलण वळ त बुलणा छा कि बड़ा बड़ा शोर शोर से बात हूणी च बल , बोला क बुबा जी ब्योली छोड़ि बरात वापस की धमकी दीणा छा बल।
भौत समय उपरान्त ब्योला क बूबा बरड़ाँद बरडांद आयी अर क्रोध म छा। तब बरात पैटी। बड़ी विचित्र ढंग से बरात भिजे गे। गाँव से भैर तक ब्योला क बुबा जी बरड़ाणु रैन , “स्सालों न भौत बेज्जती कार , देख ल्योलु स्साला तैं “
गाँव से भैर जब एक तपड़ा म बरात रुक तो ब्योला क बुबा जी , चचा जी अर द्वी चतुर मनिखों मध्य वार्ता चौल। अर फिर द्वी चतुर मनिख , ब्योला क चचा अर एक बुड्या बरात से अगनै भगण जन चलण मिसे गेन।
घाम अछलेण वळ छे , बरात धीमे धीमे गंतव्य क जिना चलणी छे कि एक चतुर मनिख वापस आंद दिखे अर वैन ब्योला क बुबा जीक कंदूड़ म कुछ ब्वाल अर ब्योला क बुबा जी खुसी म नचण मिसे गेन।
अब बरात रस्ता से भैर दुसर गाँव ओर लिजये गे। तै गाँव म एक घर क अगनै हैंक ड्वाला तयार छौ। तखम बरात रुक अर मंडाण जन माहौल म बराती नाचिन। फिर इख बिटेन ब्योला क दगड़ द्वी ब्योली चलिन अर ये गां की ब्योली क दगड़ द्वी बिनारु बखरी अर द्वी खस्सी बुखट्या दहेज का बि चलणा छा।
वास्तव म क्या होइ कि ब्योला क परिवार म अहम को आधार पर ब्यौ म ब्योली से बिनारु बखरी अर बुखट्या लाणों संस्कृति छे। जैक दहेज म बखरी व बुखट्या नि आओ तो वीं मौ की स्वार भारों मध्य बेज्जती हून्दी छे। इना ब्योली वळ सिल्सवाल छा जो शिकार पर हथ तक नि लगांदन तो बखर ना पाळदन ना ही दहेज म दींदन। ब्योला क बुबा जीन दहेज म बखर -बखरी मांग कार तो सिल्सवाल लोगों न बिलकुल मना कर दे कि हम बेटी तै अणबिवा रण डोला पर मारणों हेतु बखर बखरी दहेज म नि द्योला।
ब्यौ से पैल इख पर छ्वीं इ नि लग छे कि सिलस्वाल लोक शिकार नि खांदन ना ही बखर बखरी दहेज म दींदन। ब्यौ समय बात बिगड़। ब्योला क बुबा जिक अहम पर चोट लग अर गुस्सा म ब्योला कुण हैक ब्योली बि रुप्या देक वैदिन ही लये गे।
