वन दोहन अर जब तक लगदी बणाग कि घटनों को बुरांश कि सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़नू छ। उत्तराखण्ड को धरोहर फूल बुरांश अपणु अलग हि महत्व रखद। बुरांश का जंगल पर्यटकों तैं अपण तर्फ आकर्षित कनै योग्यता रखद। यूं फुल्वी मनोहर घटना तैं व्यखद अर वेका डालों से गुजरदी ठण्डी हवा गर्मी से बेहाल मनख्यों का मन मा एक निराली शांति को आभास करौंद। रूड्यों कि तपदी तपिश मा उत्तराखण्ड कि नदी घाट्यें अर दरों मा फैल्यां अनंत बुरांश का जंगल घाट्यों मा बगदा रौला-गदनो मा पाणि कि उपलब्धता बणैकि रखणै क्षमता रखदन। यूं जंगलों का छोड़ किनारों मा होण वलि खेती जादा उत्पादकता अर पौष्टिकता वलि बतै जांद। यांक अलावा क्षेत्रीय लोग लाल बुरांश का फुलु तैं खाकि वेतै अपण जीवन को अटूट हिस्सा कायमा कन मा मददगार होंदन। अफसोस यीं बातौं छ कि कुछ टैम बटी बुरांश का जंगलों पर मनख्यों न आरी चलौणु शुरू कर्फ्यू छ। यांसे जख जंगलों को घनत्व त घटणु हि छ दगड़ दगड़ि पर्यावरणीय क्षति बि होणी छ जो कि चिंता का विषै छ। जंगलों का अवैज्ञानिक दोहन अर बणाग कि घटनों का चल्द वन क्षेत्र घटदो जाणू छ। यांको असर साफ द्यखणो मिल्नू छ।
मुनाफा कमौणै असीमित सोच का चल्द हम जीवन का आधार जंगलों को अस्तित्व खत्म कनै जुगत मा लग्यां छां। घटदी वन सम्पदा का कारण हमरि शारीरिक क्षमता पर बि असर पड़नू छ। यांक चल्द बढ़दी बीमार्यों, दम तोड़दी संवेदनों अर संस्कृति व संस्कारों का औण वलों बदलाव साफ द्यखणो मिल्नू छ। बुरांश पर पर्यावरणीय क्षति को असर दूद्यखे जै सकद। यानि वेका चटख लाल रंग कि रंगत फीकी पड़द जाणी छ। बुणचैरू खुण जंगलों मा रैणु मुश्किल होणू छ। सुखदो जल-स्रोतों न मनख्यों कि चिन्ता बढ़े दुये। वुन जल स्रोतों का सुखणा हौर वि कथगै कारण छन पर बणाग कि घटनों से वन सौन्दर्य अर वनों को घनत्व घटणु मनख्यों अर जीव-जंतुओं का अस्तित्व पर सवाल पैदा करे जाणा छन।
मूलरूप से बुरांश का डाला 20-22 फीट उच्चा होंदन डालों कि अधिकतम चार से पांच फीट मोटा होंदा। डाला छिल्का हल्का लाल अर फीका रंग का होणा अलावा पत्तों कि घणी हैर्याली का कारण बुरांश वन ठण्डा अर ऑक्सीजन से भरपूर होंदन। लाल-लाल फूल गुच्छों का रूप मा होंदन। यूंको प्रयोग प्राचीनकाल बटी कि स्थानीय जणगुरू लोग दवैयूं का निर्माण मा कर्द औणा छन। गढ़वाल-कुमाऊं कि खड़ी पर्वत श्रृखंलों मा फैल्यां बुरांश का जंगल वखा लोग्वी जीवन रेखा की भूमिका अदा कर्दन। गढ़वाल मण्डल का पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, ग्वालदम अर पिंडर घाटी बुरांश का जंगल छन। जबकि कुमाऊं मण्डल का गंगोलीहाट, लमकेश्वर, पाताल, भुवनेश्वर, बेरीनाग, मुनस्यारी, चौकोड़ी, चम्पावत, कौसानी, रानीखेत, अल्मोड़ा, देवीधूरा, लोहाघाट, ओखलकाण्डा अर चम्पावत समेत सुदूर नेपाल सीमा से लग्यों उच्चा डाण्डों मा बुरांश का जंगल अपणि सुन्दरता को आभास करौंदन।
भूमिका अदा कर्दन। गढ़वाल मण्डल का पौड़ी, टिहरी, उत्तरकाशी, चमोली, ग्वालदम अर पिंडर घाटी बुरांश का जंगल छन। जबकि कुमाऊं मण्डल का गंगोलीहाट, लमकेश्वर, पाताल, भुवनेश्वर, बेरीनाग, मुनस्यारी, चौकोड़ी, चम्पावत, कौसानी, रानीखेत, अल्मोड़ा, देवीधूरा, लोहाघाट, ओखलकाण्डा अर चम्पावत समेत सुदूर नेपाल सीमा से लग्यों उच्चा डाण्डों मा बुरांश का जंगल अपणि सुन्दरता को आभास करौंदन।
बुरांश तरू क्षेत्रीय जनता वास्ता न सिर्फ जीवनदाता का रूप मा यखे जांद वखि फुल्लु उपयोग धार्मिक अर आध्यात्मिक अनुष्ठानों मा बि करे जांद। लोग पूरा वन क्षेत्र तें द्रद्यबतों खुण समर्पित कैरी चल्दन। लोकमानस मा जैकी छवि न्यायकारी अर अन्याय नष्ट कन वलों अनिष्ठ कर देण वलि मने जांद। कुमाऊं मण्डल का जादातर क्षेत्रों मा बुरांश मिश्रित वन लोकदेवी, लोकदेव गंगानाथ अर लोक द्रयवता अर जनता का आराध्य देव गोलज्यू तैं समर्पित कनै परम्परा छ। यूं जंगलों पर वन विभाग को लाव लश्कर बि एकाधिकार कायम कैकि नि रख सकदो। जीवन क आध्यात्मिक से जुड्यां बुरांश को कब अर कै ढंग से दोहन कन यो सब स्थानीय जनता कि लोक परम्परों पर निर्भर कर्द। एकदां जो जंगल लोग दद्यबतों तैं अर्पित कर दिये जांद त वख मानवीय गतिविधि अपवी बंद हवे जांदन। य व्यवस्था क्षेत्रीय जनता कि आम सहमति का आधार पर करे जाण से स्थानीय जनजीवन से जुड्यां बुरांश कि रक्षा कनौ शैद पुराणा लोगुन कु नियम-कैदा निध ििरत कै छा। सबसे पैलि जंगलों तें कुल दूद्यबतों से जोड़ दिये गये। ताकि लोग निर्धारित कै छा। सबसे पैलि जंगलों तें कुल दद्यबतों से जोड़ दिये गये। ताकि लोग निर्धारित आचार संहिता को उल्लंघन कन से डरन। कथंगै जगों त यिना जंगलों का प्रवेश कन पर बि प्रतिबंध छ। यूं जंगलों मा प्रवेश का तमाम बाटाघाटों मा खड़ा डालों ऐंच पीला कपड़ों कि झण्डी लगै दिय जांदन। यांसे पता चल जांद कि ये जंगल कि सीमा शुरू हवे ग्ये। आरक्षित अर पंचैती वनों कि अपेक्षा देववनों का रखरखाव पर क्वी खर्च नि आँदो। यख न कै पतरोल कि जर्वत होंदी अर क्वी धर्मधार लगै जांदी। लोगु का मन मा स्वतः हि व्यबतों तै समर्पित वन क्षेत्र का प्रति श्रद्धा अर सम्मान को भाव होणा कारण क्वी वन आचार संहित को उल्लन नि कदों।
आज हमरा राजकीय पुष्प बुरांश को अस्तित्व खतरा कि सीमा पर छ। मनख्यून अवैज्ञानिक दोहर अर जंगलों मा हर साल होण वलि बणाग कि घटनों का चल्द खासतौर पर बुरांश का अस्तित्व पर पर्यावरण वैज्ञानिकों तैं चिंता सताणी छ। जीवन को रैवार देंदा जंगलों को विनाश हमारि सांसों कि स्वच्छता पर सवालिया निशान लगौणू छ।
वास्तव मा एक मरीज हैं जन डाक्टर ऑक्सीजन द्येकि वेकि प्राण रक्षा कर्द वुनि कुदरत मा फैल्यां डाला बूटा बेहिसाब आक्सीजन देकि हमर जीवन हैं स्वस्थ रखणै जिम्मेदारी समलदन। वो बात अलग छ कि हम य आम आदम यीं बात तें जणनै कोशिश नि कर्दा पर परोक्ष रूप से बिना क्वी शुल्क ल्हियां वो हमतें जीवनदान देणा रैंदन। आज मनखि भौतिकता कि अंधी दौड़ का चल्द पैसा कमौणौ जल-जंगल जमीन को मनमर्जी को दोहन कन पर लग्यूं। मुनाफा कि प्रवृत्ति का चल्द हम मानव से दानव बणद जाणा छां। यानि अगर यिनि वन दोहन प्रक्रिया चल्नी रैलि त वो टैम दूर नहीं जब हमतें ऑक्सीजन सिलिण्डर ल्हेकि घर बटी भैर निकलन पडलो।
