रंत रैबार ब्यूरो
नई दिल्ली। हिंदी अकादमी दिल्ली द्वारा देश का प्रथम डीलिट् डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल जी की 125वीं जयंती की पूर्व संध्या पर त्रिवेणी सभागार मण्डीहाउस म एक संगोष्ठी कु आयोजन करेगे। वीं संगोष्ठी की अध्यक्षता ब्रजेन्द्र कुमार सिंघल, विशिष्ठ अतिथि प्रो नन्द किशोर पांडेय अर वक्तओं म डॉ देवेंद्र कुमार सिंह, डॉ राजकुमार प्रसाद, कुमार अनुपम अर हिंदी अकादमी का सचिव संजय गर्ग आदि लोगों ला डॉ बद्ध्वाल जी का व्यक्तित्व अर कृतित्व पर बिस्तार से बात कैरी।
डॉ पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल कु जन्म 13 दिसंबर, 1901 खुणि पौड़ी गढ़वाल का पाली गाँ म हुए अर निधन मात्र 43 सालै उम्र म 24 जुलाई, 1944 खुणि है। बड़थ्वाल जी कु जन्म तथा मृत्यु द्वी देवयोग से वोंका का गर्गी पाली लैन्सीडौन का नजीक म ही है। डॉ बड़थ्वाल हिंदी म डी. लिट. की उपाधि प्राप्त करण वाळा पैला शोधार्थी छाया । वूल अनुसंधान और खोज परंपरा कु प्रवर्तन कैरी व आचार्य रामचंद्र शुक्ल, बाबू श्यामसुंदर दास की परंपरा हैं अगनै बढ़ाते हुए हिन्दी आलोचना हैं मजबूती प्रदान की। बड़थ्वाल जी ला भावों व विचारों की अभिव्यक्ति खुणि भाषा त हौरि बंड्या सामथ्र्यवान बणैकि विकासोन्मुख शैली तँ समणी राखी । बड़थ्वाल जी ल अपणी गंभीर अध्ययनशीलता अर शोध प्रवृत्ति क कारण हिन्दी म प्रथम डी. लिट. हूंणा गौरव प्राप्त कैरी। बड़थ्वाल जी ला अपणी साहित्यिक छवि के दर्शन बचपन म ही करें दे छाया। बाल्यकाल म वूल ‘अंबर ‘नाम. से कविता लिखण शुरू कैरी याली छौ। किशोरावस्था, म वूल कहानी लिखणु शरू कैरी याली छौ। कानपुर म अपणु छात्र जीवन के दौरान ही ‘हितमैन’ नामक अंग्रेजी मासिक पत्रिका कु संपादन कैरि अर अपणी संपादकीय प्रतिभा सबतें दिखै। जबरि बड़थ्वालजी म साहित्यिक चेतना जगी वे बगत हिन्दी क समणी कै चुनौती है। बड़थ्वालजी ला परिदृश्य म अपणी अन्वेषणात्मक क्षमता का दम पर हिंदी क्षेत्र म शोध की सुदृढ़ परंपरा की नींव डाली। संत साहित्य क संदर्भ म स्थापित नवीन मान्यताओं ला बद्ध्वाल जी की शोध क्षमता तैं उजागर कैरी बड़थ्वाल
जी ला पैली दो संत, सिद्ध, नाथ अर भक्ति साहित्य की खोज व विश्लेषण म अपणी अनुसंधनात्मक दृष्टि लगै ।
बड़थ्वाल जी कु मनणु छौ कि, ‘भाषा फल्दि-फुलदी रालि ता साहित्य म, अंकुरित होलि व बोलचाल म बि भाषा मंजे-मंजे की साहित्यिक भाषा बणी जालि। बथ्वाल जी ला संस्कृत, अवधी, ब्रजभाषा, अरबी एवं फारसी क शब्दों हैं खड़ीबोली क व्याकरण व उच्चारण म प्रयोग कैरि। डा? संपूर्णानंद जी ला ठीक बोली कि, ‘यदि आयु धोखा नि देंदी ता बड़थ्वाल जी हौरि वि कै गंभीर रचनाओं को, सर्जन करदा। जीवन का चार दशकों म ही बद्ध्वाल जी ला जु काम कैरी वो हर कैका बसा नी। डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल जी ला अनुसंधान की जु सुदृढ़ नींव डाली वांका खातिर सदन्नौ वो याद करे जाला। हिन्दी जगत म बड़थ्वालजी ला अपनी शोध प्रव्रति अर समीक्षा दृष्टि क कारण ही पछ्याण बणाई। लेकिन बूका ‘कणेरीपाव’ ‘गंगाबाई’ ‘हिंदी साहित्य म उपासना का स्वरूप’, ‘कवि केशवदास’ जना विचारात्मक निबंधों म वाँकी निबंध कला का उत्कर्ष देखी वृंका निबंधकार रूप त बि हिंदी संसार म भरपूर सरहाना मील । बद्ध्वाल जी को मुख्य प्रकाशित कृतियों म ‘योग प्रवाह’, (सं. डॉ? सम्पूर्णानंद) ‘मकरंद’ (सं. डॉ ? भगीरथ मिश्र), डा? पीतांबरदत्त बड़थ्वाल क श्रेष्ट निबंध’ (सं? गोविंद चातक) आदि छन। बूंला कवि गोरखनाथ की रचनाओं का संकलन अर संपादन कैरी जु ‘गोरख बानी’ क नाम से प्रकाशित है।
हिंदी के अतिरिक्त अंग्रेजी म बि वृंला कुछ श्रेष्ठ साहित्यिक निबंध लिखी, जाँमा मिस्टिसिज्म इन हिन्दी पोयट्री’ और ‘मिस्टिसिज्म इन कबीर’ विशेष उल्लेखनीय छन। बड़थ्वाल जी क निबंधों की विशिष्टता या छ कि निबंध का मूल भाव प्रारंभ म ही स्पष्ट हे जंदान। निबंध के प्रारंभिक वाक्य रोचक प्रस्तावना जनु उभरदन।
बड़थ्वाल जी ला शोध लेखों अर निबंधों क अतिरिक्त ‘प्राणायामविज्ञान व कला’ तथा ‘ध्यान से आत्म चिकित्सा’ जनि पुस्तक बि लिखीं न। गढ़वाली लोक-साहित्य की तरफ बि बड़थ्वाल जी को गैरु रुझान छौ। बच्चों खुणि वृंला ‘किंग आर्थर एंड नाइट्स आव द राउड टेबल’ कु हिन्दी अनुवाद वि कैरी। शोधकर्ता व निबंधकार क साथ-साथ बड़थ्वाल जी अपनी दार्शनिक प्रव्रत्ति खुणि बि विख्यात छाया। आध्यात्मिक रचनाओं तेन वूला अपरु अध्ययन को आधार बणाई। धर्म, दर्शन अर संस्कृति की विवेचना करी। बुले जांद कि मस्तिष्क की दासता बूंका उसूलों व स्वभाव क विपरीत छौ ।
यांका अलावा बि डॉ पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल जी का ज्ञान, विज्ञान का क्षेत्र म भौत कुछ छौ जै तैं समझणु व सहेजणु जरुरी छ।
ये आयोजन म हर वक्ता ला बोलि कि बड़थ्वाल जी ला हिंदी साहित्य संसार खुणि एक खिड़की खोली कि आप म अगर हौसला व विजन च ता आप कुछ भी कैरी सक्दो। जीवन म उतार, चढ़ाव अर दुःख-बीमारी व निराशा का दगडी बड़थ्वाल जी ला अपणु काम व सोच हैं अगनै बढ़ाई।
ये आयोजन म हिंदी, गढ़वाली भाषाओं का विद्वान मनीषियों ला शिरकत कैरी। गढ़वाली का साहित्यकार सर्वश्री रमेश चन्द्र घिल्डियाल सरस, दर्शन सिंह रावत, डॉ सतीश कलेश्वरी, जयपाल सिंह रावत, उमेश चंद्र बंदूणी, दिनेश ध्यानी समेत कै साहित्यकार उपस्थित छा।
ये मौका पर हिन्दी की द्वी पुस्तकों कु लोकार्पण बि हे। कार्यक्रम को संचालन कुमार अनुपम ला कैरी।
