रंत रैबार ब्यौरा ….
वन मंत्री सुबोध उनियाल न पिछला दिनु वन मुख्यालय मा वन विभाग की समीक्षा बैठ क मा बणांग तैं रोकण वास्ता अबि बटि तैयारियां कन्न का निर्देश देनि। उत्तराखण्ड का पहाड़ी क्षेत्रों मा बणाग वखै नियति बण ग्ये। हर साल सैकड़ों हेक्टेयर बण फुकेकि राख वे जांदन। पर्यावरण कि दृष्टि से संवेदनशील करीब 70 प्रतिशत वन क्षेत्र वळा ये प्रदेश मा बणों कि आग हर्बि-हर्षि विस्तार ल्हेंद जाणी छ। अब वो जंगळों से लगीं बसावटों त पौछण बैठ ग्ये, य बात नी छ कि जंगळों से लग्यां गौंका लोग चुप बैठ्यां छन। वो बि भरसक कोशिश कना छन कि जंगळों तैं आग का सुपुर्द होण से बचै जाव। फिर बि जंगळ जख तख सुलगाणा छन। वनकर्मी बि सीमित संसाधनों का चल्द अग्यां रोकणो गौं वळों से मदद ल्हेणा छन बावजूद मौसम का हिसाब से निर्मित विभागीय रणनीति मा जगा-जगा झोळ नजर औणा छन। दुन्य कख बटी कख पौंछ ग्ये पर हमरो वन विभाग अपण वन रक्षकों तैं झांपों से आग नियंत्रित कनौ प्रशिक्षण देण तक सीमित छ। झांपा यानि डाळों से पत्तीदार शाखा काटी वूतें झाडु का रूप मा इस्तमाल कनौ जुगाड़। यानि आज कि विभाग 19वीं सदी का तौरतरीकों से बणाग पर नियंत्रण कना डयार कनू छ। हालांकि यो बि कारगर तरीका छ पर यांसे अगनै बि त क्वी तकनीकी विकसित करे जै सकद आग मुंजौणौ।
य बात नी छ कि विभाग मा तकनीकी यंत्रों का अभाव हो पर बूंको इस्तमाल पहाड़ों मा बि सुविधाजनक रूप से करे जै सको बूंका पास यिनी क्वी तकनीकी नी छ। हालात यि छन कि जंगळ कि नयि पौध हो चै बड़ा डाळा हर्बि-हर्षि आग कि भेंट चढ़ना छन। उत्तराखण्ड का जंगळों तैं यीं दयनीय स्थिति से बचौणो सरकार तैं कारगर उयार कन चयेणा छन। विभागीय अधिकारी होवन चै मंत्री संतरी से स्थिति पर अफसोस कन तक सीमित छन। वस्तुस्थिति या छ कि पिछला तीन-चार साल का दौरान हजारों कि संख्या मा बनि-बन्यी प्रजाति का डाळा लगै ग्ये छा वख करीब 25 हजार पादप डाळु बणन से पैलि हि झुलसे ग्येनि ।
जाणकार बतौणा छन कि बण क्षेत्रों मा चूंकि जमीन सूखी रैंद यानि नमी कि कमी का कारण अग्यां तेजी से होंद। वृंको सुझौ छ बल कि जंगळों मा जमीन कि नमी बणी राव यांक वास्ता विशेष प्रयास करे जाण चयेणा छन। जंगळों कि नयी स्थिति अपेक्षाकृत बणाग का वास्ता जादा जिम्मेदार छा। ये वास्ता आकाशीय पाणि कि बूंदों का संरक्षण पर विशेष फोकस करे जाण चयेणू छ।
हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों मा जंगळों का बीज जगा-जगा खाळ बणी छन। शैद मनरेगा का तहत स्थानीय ग्रामीणों न यो काम करि होलु पर एक छोटा सि अंतराल का वास्ता यो कार्यक्रम चलै ग्ये बल, जबकि जंगळों मा खाळी बणौणौ कार्यक्रम तैं अभियान कि शक्ल मा चलौणै जर्वत छ। यांसे न सिर्फ वणों तैं जादा नमी मिललि बल्कि पहाड़ कि घायूं मा चल्न वळा बारामासी जलस्त्रोत बि चार्ज राला।
यांक अभाव मा रूड़ पड़दै यि धारा पंदेरा सुखि जांदन अर लोगु खुण पीणा पाण्यू अकाळ पड़ जांद। यांसे जंगळों कि घरती मा नमी रैण से वणाग कि संभावना बि कम वे जांद।
सरकार तैं वर्षों कि देखभाळ को जिम्मा गौं वळों का. सुपुर्द कर देण चयेणू छ। बदला मा वूतै जर्वत का मुताबिक जंगळों बटी चारापत्ती या इमारती अर जलावन कि सुखीं लकड़ी कठा कनै छूट देण चयेणी छ। हालांकि यिनि सुविधा मिल्न से कुछ लोग वनों को अति दोहन बि कर सकदन पर या खुण वनकर्फ्यू तैं कुछ अधिकार
दे दिये जाण चयेणा छन। वो अलग बात छ कि वन संरक्षण का
वास्ता कथगै कानून बण्यां छन फिर बि वृंको अतिक्रमण होणु आम बात छ। कुल मिलैकि यो बोले जै सकद कि जब तक कै व्यक्ति य संस्था/समुदाय तैं वणों तैं अग्यां से बचौणो जिम्मेदारी नि दिये जांदी यिनि घटनों पर रोक नि लगै जै सकदी। भले ही यां खुण व्यवस्था कन वळा कति कदम उठाणा छन पर जब तक इमानदारी सि काम नि करे जालु कुछ होण वलु नि छ।
