रंत रैबार ब्यौरो…..
पहाड़ मा बाघ क आतंक थमणा कु नौ नि लेणू छ। बाघ आये दिन लोगुं पर हमला कन्ना छन। अबि तक कति लोग ये का शिकार बणी गेन। मानव-वन्य जीव संघर्ष प्रदेश मा विकराल रूप लेंद जाणू छ। इनु क्वी दिन नि छ जख प्रदेश का कै बि हिस्सा सि दुखद खबर नि ऐ हो।
सरकार तैं चैंद कि ई समस्या का समय रैंद कुछ हल खोले जाव। जंगली जानवरों कि गौं/शहरों मा घुसपैठिये आतंक को वातावरण बण्द जाणू छ। पहाड़ हो चै मैंदान सबि जगा गुलदार कि दखल जब तक दूसखणो मिल जाणी है। राज्य बण्यां 26 साल हवे ग्येनि पर सत्ताधारी नेतों न कबि यीं तर्फ ध्यान नि ये कि वन्य हिंसक जीवों कि मानव बस्त्यों मा घुसी भय अर मौत को आतंक मचौणे समस्या का निदान खुण क्य करे जाण चयेणू छ।
हालात बयां कना छन कि जैं रफ्तार से मानव-वन्यजीव संघर्ष कि घटना प्रकाश मा औणु नीति नियंतों खुण एक चुनौती बणी छ। क्य यां पर हमरा नेतों तैं विचार नि कन चयेणू छ। सवाल यो छ कि जंगल कि चौखट नंधै कि यि हिंसक जीव मानव बस्तयों मा किलै औणा छन। एक सीधो सि जवाब होंद कि चूंकि जंगलों को कटान अर जंगली जानवरों का पर्यावास मा मनख्यों को अतिक्रमण यांकि वजै छ। मनख्यों कि बस्ती मा घुसणु क्वी बि जंगली जानवर सही नि समझदो होलो। किलै कि मनखि हि वृंको सबसे बड़ों दुश्मन होंद यीं बात तैं वो जण्दा छन पर फिर बि शहरों कि घणी बस्त्यों मा गुलदार को प्रवेश शैद कुछ हौर हि तर्फ संकेत देणू छ। खासतौर पर गुलदारों न शहर-अर गौं क्षेत्रों मा आतंक को माहौल तयार कर्फ्यू छ। खेत-खल्याण हो चै घर-गुठ्यार कखि वि लोग सुरक्षित नि छ।
कब अर कख गुलदार समणि आकि चुनौती दे द्या कुछ नि बोले सकेंदो।
राजाजी नेशनल पार्क अर जिम कार्बेट पार्क को संधि क्षेत्रों मा बाघ को आतंक आम बात छ। लगभग रोजाना आम जनता मा वां यीं बातै सोच आम छ कि सरकार तैं वींकि रक्षा कि चिंता नी छ। वो सिर्फ हर्जाना देकि अपण कर्तव्य कि पूर्ति मान लेंद। जो कि जनता तैं सुरक्षा देणै शासन कि गारंटी को मखौल छ। वो पशोपेश कि स्थिति मा छन कि वो अगर हिंसक जानवरों तैं गोली मार्दन त जेल हवे जैलि अर अगर यिनु नि काँ त चूंकि जिंदगी कि गारंटी खत्म होंद। यीं दुविधा को निदान सिर्फ सरकार को छ। अगर वो हि जनता कि अनदेखी करलि त व्यथा कैतै सुणेलि।
आंकड़ा बतौंदन कि राज्य गठन का बाद सि अबि तक सैकड़ो लोगु कि ज्यान जंगली जानवर ल्हे चुकि ग्येनि। जबकि यांसे द्विगुणा घायल अर अंगहीन होयाँ छन। यानि जो मर ग्ये वो त समझा तर ग्ये पर जो अंगहीन वेकि ज्यूदा छन वूकि जिन्दगी न नर्क वे ग्ये समझा। क्या प्रदेश का नीति नियंता यीं बात पर कबि मंथन कनौ तयार होला। ये फिर जनता यिनि यूं जानवरों को गुफ्फा बणद रैलि। हां अबि तक प्रदेश कि तमाम सरकार चिन्ता त व्यक्त कर्दी पर यांसे क्वी फैदा नी छ। जब तक क्वी कारगर नीति नि बण्दी वन्य जीव मानव संघर्ष चल्द रालो। यीं बात पर मंथन कि जर्वत छ।
एक बात त पक्की छ कि मैं रफ्तार से जंगली जानवर मानव बस्त्यूं कि तर्फ रूख कनी छन त वख यानि जंगल मा सब कुछ ठीक नजर नि औणू छ। यानि जंगल कि आजाद जिंदगी छोड़ी व मनख्यों कि बस्ती मा एकि जिंदगी खतरा डाली वो क्य प्रदर्शित कन्ना छन। क्य वू खुण वख भोजन कम पड़ गये। क्य बूंका वास्ता रैणै जगा नि बचीं छ। यानि क्वी न क्वी कारण जरूर छ। यां पर हमरा नीति नियंतों तैं विचार कन्न पड़लो। य एक समस्या छ जु आम जनता का सरोकारों से जुड़ी छ। यांको जथगा जल्दी हवे सको समाधान खोजण होलु अर वन्य जीव संघर्ष की घटनाओं तैं रोकण वास्ता ठोस कदम उठाणा होला।
