(सुनीता ध्यानी)
कैखुनि निवति कैखुनि ताति जहाँं च हवा।
सौंण असाढ़ मा बकि बाति हुयीं च हवा ।।
बरखा दगड़ शराब बरख ये बसगाळ । रौळ-बौळ करदि उत्पाति हुयीं च हवा ।।
कर्मठ जुझारु किसाणों कि बाढ़ अयीं च । कै कि बदौलत खुरापाति हुयीं च हवा ??
बादल बरखा कुड़ी का गीत रुसाई गिन। हवाबाज़ी कि बल दिनराति जहाँं च हवा।।
रूझि-भीजि गिन बरसों बटि सुखीं गात ।
बेहोशियों मा राति-बिराति हुयीं च हवा ।।
तुमरि ढैया ढळकाणों बक्सा बौकणा छौं । रौला गद्यरों मा साढ़े साति हुयीं च हवा ।।
चुल्लु चौका तक ही नि रयं बेटी-ब्वारी।
चलो कुछ त जरा करामाति हुयीं च हवा ।।
