व्यंग मात्र
(संदीप गढ़वाली)
गौं गयूं रौ आज ब्याळि त खूब रौनक छै। सड़क्यूं फुण्ड घुमण वळा लोग । चौक तिबरि मा कछड़ी तैल्या मैल्या ख्वाळ हल्ला हँसारत धवड़ि ।
जंगळ जनै ग्यो त एक गूंणि अर एक बांदर बैठ्यां छाई मिन द्याखा कि वो मीथै देखी हँसण बैठि गेनि ।
मिन ब्वाल क्य बात मि क्वी जोकर छौ ? त ऊन ब्वाल कै जोकर से बि कम नि छै।
मिन ब्वाल मतलब ? तुम ठैरा नकलची बांदर अर मीथै छौ सिखांणा। अर स्यु काळु मुखकु गूंणि । तैकि मुख द्याखों आँखा नि हैन त काळु तवा । पूँछ द्याखा डाळुम बटि मुडि च लिस्वरेणी । अर मी देखी च हँसणू ।
गूणि ब्वनू द निर्भगि आदिमा तु त हमसे बि बिन्डि खत्यूं छै। हम से जादा नकळची छै। अर हम से जादा रंग बदलण वळु छै ।
मिन ब्वाल हैं गूणी बिन्डी न बोल तुमरू सर्या गढ़वाळ कु नास कर्फ्यूच । पुंगडि पटळि तुमन चौपट कैरि देनि चौछ्यडि च बांजू प्वड्यू ।
गूंणि ब्वनू — हैलो मिस्टर नकली गढ़वाळि अपणि जुबान थें लगाम दे । पैली इन बता सालभर मा द्वी चार दिन किलै आँद तुम फरि यु पहाड़ प्रेम कु भूत
मिस यू गढ़वाळ
? अरे सर्या साल जु गौं मा मनिख बच्यां छन वो हमर वजै से छन ।
बूढ़ बुड़या ज्यूंदा छन कि ना याथै पता कनौ हम लोगु कि धुर्पळि मा जन्दौ तुमर जन हम फोन कैरि कन गिच्चु नि छल्यान्दा।
और सुण बता कखम च त्यारु अर तेरी घरवळि की पुंगणि आबाद कई। बता कखम च त्यारु सार सग्वडु चल्तु कर्फ्यू ?
अर तुम पहाड़ थें अर ये गढ़वाळ थैं कतगा प्रेम करदौ मीथै नि बतावा । अरे चार फोटु पुगड़ौ की, द्वी सेल्फी धारा पंदेरौं की, चार बीडियो गौं की, अर थौला अर कुटरी भोरि कन ली जन्दौ वाखुणै तुम ब्वना छौ कि तुम पहाड प्रेमी छौ ।
अरे कैदिन गौं मा टीन, रद्दी, प्लास्टिक वळा आंदा छाई अर बुर्या भोरि ली जान्दा छाई अर बदल मा दे जान्दा छाई द्वी मुठि चांणा अर द्वी मुठि मूंगफली।
मिन ब्वाल अबे साले गूंणी तेरी इतगा हिम्मत तिन मीथै एक कबाडी वळा का बरोबर समझि ।
उ ब्वनू अबे गढ़वळि तुम त कबाडि वळु से भी जयां बित्यां छौ । वो त कम से कम कबाड़ लिजान्द । अंबे तुम ता एक किलो मिठै अर द्वी फोळि क्याळा ल्हेकन अंदौ अर बदला मा ली जन्दों खैरी कैरि कमयीं दाळ गैथ क्वादु, लगुळि जपकै जपकै कन फूल फरै गुदड़ी कखड़ी । बै
बाबू की वृद्ध पिंसन तक ली जन्दो और सूण तुममा बटि कुछ त इतगा जयां बित्यां छन कि ब्वै बाबू की कंटरोळा राशन तक ली जन्दीन ।
अर हम गूंणी ‘बांदर, रिक्क, बाघ बंगाली, बिहारी अर डुट्याल छौ जुयु पहाड़ यु गढ़वाळ रयूंच। नथर तुम जना टूरिस्ट त जब बि और गन्दगी कैरि चलि ग्यो ।
चाहे हरिद्वार श्रृषिकेश देखा या या देरादून मसूरी नैनिताल ।
बात त वो सै ब्वना छाई चाहे जानवर ही छन। पर फिर बि मिन आदिम ( मनखी) होणु फर्ज निभाई अर गूंणी खुणै ब्वाल चल भाग इख बटै । गेट आऊट
त वैन ब्वाल यू गेट आउट ।
मिन ढुंगु उठाई त वैन अपणां दाँत दिखैन कसम से इन चमकणां छाई जन कि रोज दंतमंजन करदु ह्वालू ।
फिर वो डाळि मा बैठी खीं खीं खीं कना रैन । सैत भीथै चिढ़ाणा छाई अर दाँत दिखै कि मी फरि हैंसणा छाई ।
पर फुको हमथै क्या मतलब हम ठैरा चार दिनका टूरिष्ट । हमखणै त गूंणि को हँसणु बि अमेजिंग च खट्ट एक फोटू खँच अर चल ग्यो दिल्ली कोटद्वार देहरादून ।
