डॉ० वीरेंद्र सिंह बर्तवाल
पौड़ी। गढ़वाळि भाषा पर निरंतर काम होणू च। यीं भाषा का व्याकरण, कहानी, कविता, आणा-पखांणों पर कथगै भाषा प्रेमी काम करणा छन। 2 अर 3 अक्टूबर तँ पौड़ी मा ‘कलश’ संस्था की तरफां बिटि एक कार्यशाला वीर्याये गै, जैं मा गढ़वाळ की कथगै जगाँ का लेख्यारों, कव्यों अर भाषा का जाणकुरोंन गढ़वाली भाषा का सुभौ अर गुणों पर चर्चा करे। ये कार्यक्रम देखिक लगे कि हम स्व० कन्हैयालाल डंडरियाल, डॉ० गोविंद चातक, भजनसिंह ‘सिंह’ अर अबोधबंधु बहुगुणा जी की थाती
तैं ऐथर बढ़ौंण मा ऐथर औंणा छां। पिछला 23 बरसु बिटिन कविसम्मेलनों का माध्यम स्ये गढ़वाळि भाषा का प्रसार-संरक्षण मनोरंजन की दन्या मा
कार्यशालौं का माध्यम स्ये गढ़वाळि भाषा कु प्रचार-प्रसार कु जिम्मा भी सैंत्याली, यू गढ़वाळि का भविष्य का खातिर अच्छु रैबार च। ‘कलश’ का संस्थापक ओमप्रकाश सेमवाळ जी की हेर-देख मा संस्थान अभी तक द्वी इन्त्री कार्यशाला करियालीन। इबारै दां पौड़ी मा वीर्यायीं कार्यशाला मा भौत सारी नई-नई छीं-बात यीं भाषा का बारा मा जाणनक तैं मिलिन।
पैला दिन जगा-जगा बिटि गढ़वाळि भाषा का प्रेमी विद्वान लोग पौंछीगी छा। ये दिन गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी जी मुख्य अतिथि छा। बूंन अपणा वक्तव्य मा बोलि कि गढ़वाळि भाषा तैं अगनै बढौण का वास्ता इना कार्यक्रमों को होंणो भौत जरूरी च। गौं जब हमारा कूड़ा-बाड़ा टूटी जांदन त हम वृंकी मरम्मत करदा, तूं तैं सलौंदा छां,
की जौरत च। वून बोली कि लोकभाषा कु सम्मान होंण चह्नोंणो च। हमारा मन का असली उगार अपणी दुधबोली या भाषा मा ही भैर औंदन। नेगीजीन बोले कि गढ़वाळि भाषा को मानकीकरण होंणो आज की जौरत च। यीं भाषा मा कथगै गीत, फिल्म बणीगैंन अर कथगै विधाँ मा कथगै पोथी रंच्ये गैन। यीं भाषा कु साहित्य समृद्ध च, परंतु यीं का हौर भी संरक्षण अर प्रसार-प्रसार की जौरत च।
दिल्ली बिटि यीं कार्यशाला मा विशिष्ट अतिथि का रूप मा न्यूत्यां वकील संजय शर्मा दरमोड़ा न बोलि कि हमारी नई छवांळि ज्वा गढ़वाळि स्ये थोड़ा दूर भागणी च, वीं जब तैं यीं भाषा का बाटा लगाँण पड़लो। तक कैं भी भाषा पर गर्व न कर्ये जाओ, तब तक वा भाषा ऐथर नी बढ़ी
लेख्यारु की संख्या बढ़ण लगीं च।
विशिष्ट अतिथि हेमवतीनंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो० गुड्डी पंवार बिष्टन बतै कि वू पैली बार इनी कार्यशाला मा ऐन, भौत भलु लगी। बूंन बोलि कि गढ़वाळि भाषा का प्रति यख की
या च कि गढ़वाल विश्वविद्यालय मा यीं भाषा पर कथगै शौध होंणा छन।
..कार्यशाला मा कवितौं की बारीकी समझैँन। बूंन शोधार्थियों तैं भी कविता रंचणैकी कथगै गेड़-गुत्थी बतैंन। गढ़वाळि का गीतकार, कवि गिरीश सुंदरियाल न गढ़वाळि भाषा की व्याकरण का अंतर्गत कारक चिह्नों, क्रिया रूप अर परसर्गों पर सुंदर व्याख्यान दिने। वून बोलि कि गढ़वाळि का व्याकरण अर शब्द संपदा पर भौत हद तक संस्कृत अर हिंदी की अन्वार च। मदनमोहन डुकलान न बोलि कि काव्य दरअसल हिरदय को उद्गार च। यो उद्गार कैं भी घटना देखिक अर सुणीक या कै भी दृश्य देखिक उमड़ि सकदो। मन को उमाळ स्वाणा शब्दों मा व्यक्त कनो ही कविता च। डॉ० दर्शन सिंह नेगी ‘गढ़देशी’, न गढ़वाळि का आणा-पखाणों का बारा मा भौत छीं-बात बतैन। वून बोल्ये कि आणा-पखाणों पर पलायन को बुरो असर पड़ीगे। आणा-पखाणा हमारा लोकजीवन का सच्चा ऐना छन। यूं मा हमारी भावना, भौंण अर भाषा कु असली रूप-सरूप च। यी हमारा अनुभौ का साक्षात गवै छन। यूं मा हमारो इत्यास, भूगोल अर संस्कृति समायीं च। कथगै सालों बिटि आणा-पखांणों तै समेटण पर लग्यां नेगीजीन बतै कि आणा-पखाणा हमु तैं सच्चु बाटु बतौंदन अर जिंदगी कु सच भी बतलौंदन। रमाकांत बेंजवाल जी अर वृंकी धर्मपत्नी श्रीमती बीना बेंजवाल जी कार्यशाला मा महत्वपूर्ण भूमिका रै। आप द्वी झणा बरसो बटि गढ़वलि भाषा पर काम कन्ना छन।। रुद्रप्रयाग बिटि आयां अश्विनी गौड़ बबीता भट्ट दगड़ि कवि सम्मेलन कु भौत सुंदर संचालन करे। आपन पदै-लिखै मा लोकभाषा कु महत्त्व भलु करीक बताये। गढ़वाळी कवितौं पर शोध कन वाळा जगदंबा प्रसाद कोटनाला न कविता का सुभौ पर बात करे। वून प्रतीक, बिम्ब, अलंकार पर बोले। वून बताये कि कैं चीज जोणन स्ये कविता मा रस्यांण औंदे। गढ़वाळि कविता कु रोचक इत्यास भी बूंन बतै। महिशानंद न गढ़वाळि की शब्द संपदा पर छीं-बात लगैन। बूंन बतै कि गढ़वाल मा कु-कु शब्द कख-कख कना बोल्ये जांदन। ‘हँसणु’ अर ‘हँसणू’ जना शब्दों की बूंन गैरी व्याख्या करे। रिटैर फौजी बलवीर राणा न काव्य अर गद्य लिखण का बारा मा कथगै अणछुयीं बात बतैं। जाण्या-माण्या नाटककार, निर्देशक गजेंद्र नौटियाल, डॉ० प्रीतम ‘अपछ्यांण’, गढ़वाळि कहानीकार कमल रावत जना लोगु की मौजूदगी भी कार्यशाला मा रै। कार्यशाला कु संचालन गणेश खुगशाल ‘गणी’ न कर्ये। बीच-बीच मा वृंका संदर्भ, प्रसंग अर संस्मरण कार्यशाला मा मूळा का थिंच्वाणी मा जख्या कु तुड़का जना लगणा छा।
कार्यशाला कु खास आकर्षण गढ़वाळि भाषा कु कवि सम्मेलन रये। जै मा जगदंबा चमोला अर मुरली दीवान जना जाण्या-माण्या कव्योंन कविता सुणैन । चंमोला जी की कविता ‘हमुक तैं त विकास जगथु दिदा का नौनो कु नौं च’ अर दीवान जी की कविता ‘ब्याळि तक मजाक छै आज हकीकत ह्वेगी’ भौत पसंद कर्ये गै। डॉ० वीरेंद्र सिंह बवाल की कविता ‘सरकारी रासण का डीलर’ मा रासण का भ्रष्टाचार पर चूबण वाळु व्यंग छौ। मधुरवादिनी तिवारी, अरविंद प्रकृति प्रेमी, मनोज गुसाई, डॉ० सत्यानंद बडोनी, सुरेश स्नेही, अश्विनी गौड़, गिरीश सुंदरियाल, मनोज भट्ट गढ़वळि, डॉ० दर्शन सिंह नेगी ‘गढ़देशी’ जना कथगै कव्योंन अर गढ़वाल विश्वविद्यालय का शोधार्थियों ने अपणी सुंदर-सुंदर कविता बांचीन।
समापन पर ये कारज का धर्ता-कर्ता ओमप्रकाश सेमवाल जी न सब्बि लोगु का सुझाव लिनीन अर सब्बु कु धन्यवाद कर्ये।
