रंत रैबार ब्यूरो….
उत्तराखण्ड का कति इलाकों मा बाघ, रिख अर अन्य जंगली जीवों की बढ्दी गतिविधियों सि गौं का लोग असुरक्षित मैसूस कन्ना छन। बच्चा अब स्कूल जाण मा बि घबराणा छन। प्रशासन न कति गौं मा विद्यार्थियों वास्ता वाहन सेवा शुरू करि छ। पिछला कति दिनों बटि वन्यजीवों की बढ़दी आक्रामकता तें दिखद अभिभावक व ग्रामणी भय का मौहाल मा छन।
बढ्दा मानव-वन्यजीव संघर्ष तैं गंभीरता सि लेंद मुख्यमंत्री न उच्च अधिकारियों तैं क्षेत्र भ्रमण व आवश्यक कार्यवाही का निर्देश दिया छन। प्रमुख सचिव वन न बोलि कि मानव-वन्यजीव संघर्ष न्यूनीकरण क हरसंभव प्रयास करे जाणू छ। पहाड़ हो चै मैंदान सबि जगा गुलदार, बाघ कि दखल जब तक दूसखणो मिल जाणी छ। राज्य बण्यां आज 25 साल हवे ग्येनि पर नेता न कबि यीं तर्फ ध्यान नि ये कि वन्य हिंसक जीवों कि मानव बस्त्यों मा घुसी भय अर मौत को आतंक मचौणे समस्या का निदान खुण क्य करे जाण चैंद।
हालात बयां कना छन कि जैं रफ्तार से मानव-वन्यजीव संघर्ष कि घटना प्रकाश मा औणु नीति नियंतों खुण एक चुनौती छ। सवाल यो छ कि जंगल कि चौखट नंधै कि यि हिंसक जीव मानव बस्तयों मा किलै औणा छन। एक सीधो सि जवाब होंद कि चूंकि जंगलों को कटान अर जंगली जानवरों का पर्यावास मा मनख्यों को अतिक्रमण यांकि वजै छ।
मनख्यों कि बस्ती मा घुसणु क्वी बि जंगली जानवर सही नि समझदो होलो। किलै कि मनखि हि वृंको सबसे बड़ों दुश्मन होंद यीं बात तैं वो जण्दा छन पर फिर बि शहरों कि घणी बस्त्यों मा गुलदार व रिख को प्रवेश शैद कुछ हौर हि तर्फ संकेत देणू छ। खासतौर पर गुलदारों न शहर-अर गौं क्षेत्रों मा आतंक को माहौल ती तयार कर्फ्यू छ। खेत-खल्याण हो चै घर-गुठ्यार कखि बि लोग सुरक्षित नि छ। कब अर कख गुलदार समणि आकि चुनौती दे द्या कुछ नि बोले सकेंदो।
राजाजी नेशनल पार्क अर जिम कार्बेट पार्क को संधि क्षेत्रों मा बाघ को आतंक आम बात छ। लगभग रोजाना आम जनता मा वां यीं बातै सोच आम छ कि सरकार तैं वींकि रक्षा कि चिंता नी छ। वो सिर्फ हर्जाना देकि अपण कर्तव्य कि पूर्ति मान लेंद। जो कि जनता तैं सुरक्षा देणै शासन कि गारंटी को मखौल छ। वो पशोपेश कि स्थिति मा छन कि वो अगर हिंसक जानवरों तैं गोली मार्दन त जेल ह्वे जैलि अर अगर यिनु नि कर्दा त चूंकि जिंदगी कि गारंटी खत्म होंद। यीं दुविधा को निदान सिर्फ सरकार को छ।
