मकर सक्रांति य खिचड़ी संग्राद हूंदया मैनों को अति प्राचीन पर्व छ यो न सिर्फ भारत बल्कि विश्व का दर्जन भर देशु मा उल्लास का साथ मनै जांद। भारतीय समाज आदिकाल बटी हि खुशी प्रगट कना बहाना खोजद औणू छ। आज बि जब कवि वेका मन कि होंद त वो वेतें खूब कैंकि सेलीब्रेट कर्द। ठीक यिनि जनकि होरी, दिवाली, इगास, दशहरा, गणपति उत्सव य फिर हर मैना औण वलि तिथ्यूं तँ पर्व का रूप मा मनौणु। खिचड़ी संग्राद यानि मकरैण खासतौर पर हमरा उत्तराखण्ड मा बि एक व्यवहार कि शक्ल मा मनै जांद। हर साल 14 जनवरी खुण मनै जण वला ये पर्व को वैज्ञानिक तर्क छ बल कि यीं तिथि पर सूर्य भगवान मकर राशि पर प्रवेश कर्दन। ज्योतिषीय गणना मा हर साल यो संयोग 15 जनवरी खुण औंद। उत्तराखण्ड मा जगा-जगा ये दिन पर कौथिग आयोजित करे जांदन।
आज भले ही उल्लास अर खुशी मनौणा कथगै साधन पैदा हवे ग्येनि पर आज सि 50-60 साल पैलि यि कौथिग खासतौर पर ग्रामीण जनता का वास्ता कै महासम्मेलन से कम नि छ। गढ़वाल मा ये दिन पर गेंदी का मेला लगदन। जैमा एक विशेष तरां कि गंद बणैकि द्वी क्षेत्र का लोगु का बीच ख्यले जांद। सतपुली का नजीक सांगुड़ा देवी का पास भरेण वला ये कौथिग मा लंगूर पटी अर मन्यारस्यूं का बीच गेंदी को आयोजन होंद। ठीक यिनि कौथिग दुगड्डा का नजीक डांडामण्डी स्थित थल नदी मा लगद। यूं आयोजनों मा भाग ल्हेणा तमाम प्रवासी भँद बंद घर ऐ जांदन अर अपण क्षेत्र तैं जितौण मा पूरी ताकत लगै दिंदन। गेंदी का अलावा हौर बि आयोजन होंदन। जनकि परसुंडाखाल, गैरसैण आदि जगौ मा कौथिग आयोजित करे ग्येनि। वुन बि मकरैण पर पहाड़ का हर कस्बा बजार मा कौथिग जना उद्मये गये। ये दिन पर खाद्य का रूप मा खिचड़ी भोग लगैकि भोजन करे जांद। चौल-उड़द-तिल कि खिचड़ी को सवाद पहाड़ छोड़ी प्रवासी होयां लोग कबि नि बिसरि सकद। ये वास्ता वो चै कखि बि राला पर मकरैण यानि 14-15 जनवरी खुण खिचड़ी जरूर बणौंदन। वस्तुतः मकरैण तैं देश मा उत्तरायण, माघी, पौष संक्रांति भोगाली बिहू, शिथुर सक्रांद आदि नौं से बुलै जांद। तमिलनाडु मा पोंगल, नेपाल मा माघी संक्रांति, श्रीलंका मा पोंगल य उझवर तिरूनल, बंगलादेश मा पौष संक्रांति, थाईलैण्ड मा सोगकरन, म्यांनमर यानि वर्मा मा थियांन, कम्बोडिया मा मोहान संक्रान अर लाओस मा यिगालान्ओ का नौं से पूर्व तैं मनै जांद। दरसल भारत का जथगा बि तीज तिव्हार छन वो ग्रामीण पृष्ठभूमि से पैदा छन। मकरैण बि ये हि उपलक्ष्य मा मनै जांद। ये टैम पर ग्यूं-जौ यानि रबि की फसलों से पुंगेड़ा हैरा होयां रैदन। कथगै जगौ अगेती सरसों फुली रैंद। यिनु लगद जन कि सर्य प्रकृति हि पिंगली हवे ग्ये हो। अगर मकर संगांद हैं फसलों का उल्लास पूर्व बाले जाव त जादा उचित लगलो।
अध्यात्म अर पौराणिक कथा किस्सा का रूप मा व्यखे जाव त मकर संक्रांति सूर्य भगवान कि उपासना का रूप मा मन्ये जांद। मान्यता छ कि ये दिन पर सूर्य अपण पुत्र शनिदेव से अपिण नाराजगी खत्म कैरी बूंका घर गै छां। यो बि ये हि दिन पर राजा भागीरथ न अपणा पूर्वजों कि मुक्ति का वास्ता तर्पण करि छौ। मकर संक्रांति का दिन हि भागीरथ भगवान शिव से गंगा मांगी अपण पिछनै ल्हेकि कपिल मुनि का आश्रम से हवेनि गंगा सागर तक ल्है छा। यी वजै छ कि ये दिन हि गंगा सागर मा कौथिग जुड़द। ये हि दिन बटी ब्यो-बंद जना शुभ कार्यों कि शुर्वात होंद। चूंकि ये हि दिन मलमास खत्म होंदन। ये वास्ता लोग मकरैण बटी शुभ कार्य शुरू कर्दन। ये लिहाज से मकरैण पर्व शुभ अर समृद्धि को यो तक मने जांद। पौराणिक ग्रंथों मा सूर्य उपासना का धार्मिक महत्व को उल्लेख पाये जांद। यी वजै छ कि भारत मा प्राचीन काल बटी सूर्य कि पूजा होंद औणी छ। जै तरां ब्रहमाजी तैं सृष्टि को रचयिता मन्ये जांद। ठीक वुनि सूर्य तैं सृष्टि को पालन कन वलों मन्ये जांद। पावन गायत्री मंत्र सूर्य तैं हि समर्पित छ। सूर्य तें तेज आज अर गति मन्ये जांद। पावर गायत्री मंत्र सूर्य तें हि समर्पित छ। सूर्य तें तेज ओज अर गति को प्रतीक अर अधिष्ठाता का रूप मा मने जांद। ऋग्वेद मा बि सूर्य तैं अति प्रतिष्ठित दूद्यबतों मद्दे एक मने जांद। यो बि कि सूर्य कि मौजूदगी पर हि पृथ्वी पर जीवन कि कल्पना साकार होंद।
भारतीय ज्योतिष कि गणना का मुताबिक मकर संक्राति बटी हि दिन बड़ा होणा शुरू हवे जांदन। यानि नि बड़ा अर रात छ्वटि होण बैठदन। यांसे पुंगड़ों मा पैदा हर्याली तैं जादा ऊर्जा अर रोशनी मिलु अर वो तेजी से विकास कैरी मनख्यों कि जिंदगी को आधार बण सको। यानि मकरैण को किसानों कि जिंदगी अर भावनों तैं बि प्रकट कनौ मौका देंद। मकरैण तैं हिन्दू शास्त्रों मा पुण्य कार्यों कि शुर्वात कि तिथि मने जांद। तिल से बण्यां व्यंजनों को भोग लगौणु ये दिन पर महत्वपूर्ण मने जांद। दान-पुण्य बि ये हि दिन से शुभ मने जांद। बतौंदन बल कि सूर्य जब तक दक्षिणायन मा रैंद यानि कर्क रेखा का क्षेत्र मा होंद तब शुभ कार्यों से परहेज करे जांद पर जनि सूर्य मकर राशि मा प्रवेश कर्द शुभ मुहूर्त शुरू हवे जांदन। महाभारत को आख्यान बि छ कि अर्जुन का बाणो से छलनी पितामह भीष्म चूंकि इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त छा। ये वास्ता बूंन दक्षिणयान मा प्राण लागु कनु उचित नि मानी उत्तरायण कि जग्वांल कै छै। वो जणदा छा कि उत्तरायण म देहत्याग कन पर मनखि तैं जल्दी मुक्ति प्राप्त होंद। देश मा मकर संक्रांति कथगै ढंग से मनै जांद। ये दिन तैं पंतगोत्सव का रूप मा बि पछ्यणे जांद। लोग विशेष रूप से पतंगबजी का शौकीन मकर संक्रांति पर पंतगोत्सव का रूप मा मनौंदन। दुन्य मनद कि भारत धार्मिक परम्परों को देश छ। ये देश मा चै कथगा बि आपत्ति किलै नि ऐ हो न पर यखै संस्कृति ज्यूंदी रये। पिछला एक हजार साल त विदेशी लुटरों, हमलावरों अर धर्माध आततायूं न भौत कोशिश करि भारतीय संस्कृति तैं खत्म कनै पर वो भारतीयों का मन से अपणि परम्परों तैं खत्म नि कै सक्य। यिथगा त तै छ कि भारतीय सांस्कृतिक साहित्य मा हौर बि झणि कथगा परम्परा अर तीज त्यौहार रै होला पर जथगा बि हमरा पूर्वत वूतैं समाली रख सकिन वून भरसक कोशिश करि। तब जबकि मुगलकाल मा भारतीय अस्मिता तैं छिन्न-भिन्न कर दिये ग्ये छौ तब बि हमरि सांस्कृतिक धरोहर स्वरूप तीज व्यवहार अबि तक ज्यूंदा अर प्राणवान छन। यूतें अंक्वे समाली रखणै जर्वत छ। यांक वास्ता हर साल यूतैं पूरी श्रद्धा अर हर्षोल्लास से मनौणै जर्वत छ।
